दोनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन और जलवा है यही वजह है कि दोनों में पटरी नहीं बैठ रही है
लखनऊ, 29 जनवरी। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार को 10 महीने हो गए हैं। 19 मार्च-2017 को योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उस दिन योगी के साथ दो उप-मुख्यमंत्री भी बनाए गए थे। माना जा रहा था कि यह पिछड़ा-ब्राह्मण-क्षत्रिय समीकरण को साधने के लिए किया गया है। लेकिन यह सत्ता के शीर्ष पर संतुलन बनाए रखने की कोशिश थी। अब यह संतुलन डगमगाता दिख रहा है।
केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपना 15 साल का राजनीतिक वनवास खत्म किया। संगठन के काम में दक्ष होने के कारण पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें अपने वीटो से प्रदेश अध्यक्ष बनवाया था, लेकिन सरकार बनने के बाद कुर्सी मिली योगी आदित्यनाथ को। योगी पूर्वांचल के फायर ब्रांड हिदुत्व छवि वाले नेता हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद योगी ही सबसे बड़े स्टार प्रचारक थे। उनकी स्वीकार्यता पूरब से लेकर पश्चिम तक है। दोनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन और जलवा है। यही वजह है कि दोनों में पटरी नहीं बैठ रही है।
24 जनवरी को लखनऊ में आयोजित उत्तर प्रदेश दिवस के प्रथम समारोह में मौर्य नहीं पहुंचे। इस समारोह के विज्ञापन में मौर्य का नाम ही नहीं था, जबकि उनसे जूनियर मंत्रियों के नाम छापे गए थे। मामला तूल पकड़ा तो समापन समारोह के विज्ञापन में उनका नाम भी डाला गया और वह पहुंचे भी। लेकिन दोनों एक दूसरे से खिंचे-खिंचे रहे। केशव को 20 जनवरी को वाराणसी में हुए युवा उद्घोष कार्यक्रम में भी नहीं बुलाया गया था। फिर 23 जनवरी को योगी द्वारा बुलाई गई मंत्रियों की मीटिंग में मौर्य नहीं पहुंचे।
यह सब भाजपा के अंतर्कलह को हवा दे गया। चार जनवरी को भाटपार रानी (देवरिया) और 25 को देवरिया के राजकीय इण्टर कॉलेज में आयोजित सभाओं में केशव प्रसाद मौर्य ने मंच से मोदी का नाम तो लिया, लेकिन योगी का जिक्र नहीं किया। दरअसल, दोनों नेताओं में खींचतान 2017 के विधानसभा चुनाव के समय से ही चल रही है। अगड़ी जातियां तो बीजेपी की परंपरागत मतदाता रही हैं. लेकिन बीजेपी को जीतने के लिए पिछड़ों का वोट भी चाहिए था। इसलिए फूलपुर से सांसद रहे केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। केशव ने खूब मेहनत की।
उन्होंने मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज को बीजेपी के पक्ष में गोलबंद किया। इसलिए वह खुद को सीएम पद का दावेदार मान रहे थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने योगी आदित्यनाथ पर भरोसा जताया। हालांकि पार्टी केशव को उपमुख्यमंत्री का पद दिया. लेकिन वह इससे संतुष्ट नहीं हुए। शपथ लेने के कुछ दिनों बाद केशव प्रसाद मौर्या एनेक्सी बिल्डिंग (लाल बहादुर शास्त्री भवन) में आए। इसकी पांचवीं मंजिल पर अखिलेश यादव सीएम के रूप में बैठा करते थे। केशव मौर्य ने उसी ऑफिस पर अपना नेमप्लेट लगवा दिया। उस वक्त योगी दिल्ली में थे। जब वह लखनऊ लौटे तो केशव के नाम का बोर्ड हटा दिया गया।







