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    Home»उत्तर प्रदेश

    अली को नहीं छोड़ेंगे, पार्टी छोड़ देंगे भाजपाई शिया 

    By November 29, 2018 उत्तर प्रदेश No Comments8 Mins Read
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    नजरअंदाज कर रही भाजपा के खिलाफ मुखर होने का मौका उठायेंगे जव्वाद 
    नवेद शिकोह 
    लखनऊ, 29 नवंबर 2018: भाजपा को लेकर हमेशा से ही सॉफ्ट रहे मुसलमानों के शिया समुदाय के लोग हजरत अली पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के बयान के बाद काफी आक्रोशित नजर आ रहे हैं। अपने पहले इमाम हजरत अली को सुपर हीरो मानने वाले शियों का भाजपा के प्रति सख्त रूख सामने आने लगा है। इस बीच कमजोर शिया लीडरशिप पर काबिज होने वाले धार्मिक नेताओं ने अपनी क़ौम के जज्बातों की लाइन पर मुख्यमंत्री योगी के खिलाफ बयानबाजी करने का सिलसिला तेज कर दिया है।
    लखनऊ के जौहरी मोहल्ले की गलियों के नौसिखिया नये भाजपाई /स्थानीय नेता से लेकर योगी सरकार के मंत्री मोहसिन रज़ा, एम एल सी बुक्कल नवाब से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय नेता मुख्तार अब्बास नकवी कशमकश में पड़ गये हैं। उत्तर प्रदेश के मुखिया और भाजपा के प्रभावशाली नेता योगी आदित्यनाथ योगी ने जब से ये कह दिया है कि हमारे (हमारी पार्टी भाजपा के) बजरंग बली हैं, कांग्रेस को अली मुबारक। इस बयान के बाद भाजपा के बड़े शिया नेताओं से उनकी कौम और मीडिया सवाल कर रही है। जिसका जवाब देते नहीं बन रहा हैं। हांलाकि स्थानीय भाजपा नेताओं ने योगी के बयान का अप्रत्यक्ष विरोध करते हुए सोशल मीडिया में अली.. अली, मेरी जान अली, पहचान अली. इमान अली… लिखना शुरु कर दिया है। दूसरी तरफ भाजपा को लेकर सॉफ्ट रहने वाले मौलाना यासूब अब्बास ने सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी के हजरत अली के नाम का राजनीतिकरण करने वाले मुख्यमंत्री योगी के बयान की मुखालफत की और माफी मांगने की गुजारिश की।
    इसके बाद मौलाना कल्बे जव्वाद ने भी योगी के बयान पर अपना एतराज जताया।
    दरअसल मौलाना जव्वाद पिछले नौ-दस वर्षों से अरबों-खरबों की शिया धार्मिक स्थलों के सरपरस्त शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन को उनके पद से हटाने का संघर्ष कर रहे हैं। जिस कोशिश में कामयाब होने के लिए ही वो उन भाजपा सरकारों की तारीफ करने लगे जिस भाजपा के वो धुर विरोधी हुआ करते थे। फिर भी मौलाना को सफलता नहीं मिली।
    इस बीच मौलाना पर से कौम का विश्वास भी कम होता गया। क्योंकि एक जमाने में मौलाना जव्वाद हुकूमतों से दूरी बना कर चलते थे। वो कभी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के दर पर नहीं जाते थे बल्कि मौलाना की चौखट पर विभिन्न राजनीतिक दल के नेता लाइन लगाया करते थे। कभी करीबी रहे वसीम रिजवी से मौलाना जव्वाद जब नाराज हुए तो उसे चैयरमेन के पद से हटाने के लिए उन्हें बहुत समझौते करने पड़े। अखिलेश सरकार में भी मौलाना जव्वाद वसीम रिजवी को उसके पद से नही हटा सके। क्योंकि वसीम उस वक्त आजम खान के खास थे। और आजम खान की जिद के कारण अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव मौलाना से वादा करके भी वसीम रिजवी को बोर्ड के चेयरमैन पद से नहीं हटा सके।
    नतीजतन मौलाना ने सपा सरकार और आजम खान के खिलाफ खूब आंदोलन भी किये। पिछले विधानसभा सभा चुनाव में सपा को हराने के लिए पहली बार मौलाना बसपा को जिताने के लिए चुनाव प्रचार तक में उतर आये। और जब बसपा हार गयी और भाजपा ने सरकार बना ली तो भाजपा से पुराने गिले शिकवे भुलाकर भाजपा सरकार के करीब हो गये।
    इन तमाम कोशिशों के बाद भी योगी सरकार ने वसीम रिजवी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया और बदले में मौलाना की भाजपा परस्ती से कौम भी नया रहनुमा ढूढने लगी। ऐसे में अब मौलाना वक्फ बोर्ड को लेकर सरकार के विरूद्ध मुखर होने की रणनीति तैयार कर रहे थे। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री योगी द्वारा हजरत अली पर टिप्पणी को लेकर एक बड़ा मौका भी मिल गया है।
    मौलाना कल्बे जव्वाद सरकार के खिलाफ आरपार के मूड में दिखाई दे रहे हैं। राम मंदिर के पैरोकार वसीम रिजवी के खिलाफ कार्रवाई ना होने से खफा मौलाना की तरफ से पहले ही ऐलान हो चुका था कि यदि वसीम के खिलाफ सरकार ने कदम नहीं उठाये तो मोहर्रम के बाद वक्फ बचाओ आंदोलन सरकार के लिये बड़ी मुसीबत बन सकता है।
    मौलाना जव्वाद ने मुख्यमंत्री योगी को घेरने का सिलसिला तेज कर दिया है। हजरत अली संबधित मुख्यमंत्री के बयान के खिलाफ दर्जनों उलमा को साथ लेकर मौलाना जव्वाद ने योगी की कड़ी आलोचना की है। देशभर के उलमा (उलमा-ए-हिन्द) को लामबंद कर शिया अवकाफ की कथित लूटमार के खिलाफ सरकार को घेरने के मूड में नजर आ रहे मौलाना कल्बे जव्वाद।
    मालूम हो कि मौलाना ने कई बार राम मंदिर के पैरोकार वसीम रिजवी के खिलाफ कार्रवाई करने की शिकायतें की किन्तु सरकार ने  मौलाना की एक नहीं सुनी।
    बताया जाता है मौला अली पर आपत्तिजनक राजनीतिक टिप्पणी करने वाली भाजपा से जुड़े मौलाना जव्वाद के रिश्तेदार और तमाम शिया भाजपा से इस्तीफा दे सकते हैं। मौलाना के एक्शन में आने और मुख्यमंत्री की निंदा करने के बयान के बाद शिया भाजपाइयों पर मौलाना का दबाव तेज हो गया है।
    कहा जाता है कि शिया क़ौम अपने धार्मिक चरित्रों को लेकर जितनी भावुक है इतने भावुक दुनिया के किसी धर्म के धर्मावलंबी नहीं हैं। जिसकी एक दलील है। शिया अपने धार्मिक चरित्रों की चौदह सौ साल पुरानी तकलीफों का एहसास करके अपने सिर पर तलवारें मारते हैं… या अली.. या अली..  कह कर अपने नंगे शरीर पर धारदार छुरियों से वार करते हैं.. खून बहाते हैं.. आग पर चलते हैं.. सीना पीटते हैं.. आशूर के दिन भूखे प्यासे रहकर रोते हैं.. नंगे पैर चलते हैं..
    अपनी जान से प्यारे धार्मिक चरित्रों को अपनी जान से ज्यादा मोहब्बत करते हैं। मोहम्मद साहब के कज़िन और दामाद.. हजरत फातिमा जहरा के शौहर.. इमाम हुसैन के वालिद पहले इमाम हजरत अली शिया मुसलमानों के सुपर हीरो हैं। इनके नाम का राजनीतिकरण करने का दुस्साहस कभी किसी ने नहीं किया था।
    एक सियासी मंच पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा राजनीति प्रतिस्पर्धा की कटुता में हजरत अली का नाम इस्तेमाल करने को लेकर शिया कौम में आक्रोश बढ़ रहा है।
    योगी के विवादित बयान के चौबीस घंटे तक मौलाना कल्बे जव्वाद की खामोशी देखकर लड़खड़ायी शिया कयादत पर लपकने की कोशिश कर रहे दूसरे शिया मौलानाओं ने मुख्यमंत्री के अली संबधित बयान पर एतराज जताना शुरु किया था। दुनियाभर के शिया मुसलमानों में ख्याति प्राप्त लखनऊ के बड़े उलमा के घरानों में स्वर्गीय मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर साहब के पुत्र मौलाना यासूब अब्बास और बुजुर्ग मौलाना डा. कल्बे सादिक के पुत्र कल्बे सिब्तैन नूरी बड़े उलमा की दूसरी पीढ़ी के शामिल हैं। ये नौजवान धार्मिक नेता कमजोर पड़ी शिया लीडरशिप में कौम की कयादत का हक हासिल करने की फिराक में हैं।
    मुख्यमंत्री के अली संबधित बयान पर जब मौलाना कल्बे जव्वाद ने कोई एतराज नहीं किया और कौम में मौलाना की खामोशी पर नाराजगी पर सुगबुगाहट सुनाई पड़ने लगी तो मौलाना यासूब और मौलाना कल्बे सिब्तैन नूरी ने इस बयान पर एतराज जताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से माफी मांगने को कहा है।
    गौरतलब है कि अक़लियत में अक़लियत मुसलमानों का शिया वर्ग एक जमाने में एक बड़ी ताकत था। इस वर्ग की कयादत करने वाले शियों के रहनुमा चट्टान की तरह मजबूत थे। नेतृत्व के एक इशारे में मिनटों में शहर में शियों की लाखों की आधी आबादी सड़कों पर उतर आती थी। सरकारें इनसे इनसे कांपती थीं। शियों के रहनुमा सत्ता के मुखिया की चौखट पर चक्कर नहीं काटते थे बल्कि हुकूमतें मौलाना की ड्योढ़ी में लाइन लगाती थीं।
    मौलाना का राजनीतिकरण होते ही सब कुछ खत्म हो गया। राजनीतिकरण का आशय है कि किसी दल को हराने-जिताने के फरमान जारी करना.. हुकूमतों की बार-बार तारीफ करना.. सियासी दलों का प्रचार करना.. सरकार के मुखिया के दर पर दर्जनों चक्कर काटना…
    पहले ऐसा नही था। शिया कौम की हर जायज मांग मौलाना के एक इशारे पर पूरी हो जाती थी।
    बाइस वर्षों तक लखनऊ में मुसलमानों के धार्मिक जुलूसों की पाबंदी को शियों के नेतृत्व ने ही बहाल किया था। अज़ादारी के जुलूसों की बहाली और अवकाफ बचाने के लिए एतिहासिक आंदोलनों से सरकारे हिल जाती थीं। शिया वक्फ बोर्ड की अरबों-खरबों की सम्पत्तियों को नाजायज कब्ज़े से मुक्त करने के लिए अपने रहनुमा के एक इशारे पर लाखों शिया सड़कों पर उतर आये थे। नतीजतन अधिकांश धार्मिक स्थलों को अवैध कब्जों से खाली करवा लिया जाता था।
    रिकार्ड है कि यूपी की हर दौर की हुकूमतें नेतृत्वकर्ता मौलाना के इशारों पर ही शिया वक्फ बोर्ड का चेयरमैन तय करती थीं। विदित है कि बसपा सरकार के दौरान वसीम रिजवी को मौलाना के इशारे पर ही शिया वक्फ बोर्ड का चेयरमैन बनाने के समीकरण बनाये गये थे। वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। शिया कयादत अपने मिजाज के विपरीत ज्यों-ज्यों हुकूमतों में इन्वॉल्व होने लगी कौम अपने रहनुमा से दूर होती गयी।
    अब आसार दिख रहे हैं कि शिया समुदाय अपनी कौम के नजदीक और सियासत/हुकूमतों से दूर रहने वाले किसी धर्म गुरु को रहनुमाई के लिये तलाश रही है।
     ऐसे में दूसरी पीढ़ी के युवा उलमा कौम का नेतृत्व लपकने के लिए सियासत से दूर और हुकूमतों की कमियों पर हमलावर तेवरों को पेश करने लगे हैं।

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