व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
एक सज्जन ने मुझे सलाह दी कि तुम्हें थोड़ा डूबकर लिखना चाहिए। इससे लेखन में निखार आएगा। सलाह मैंने मान ली। अगले ही दिन घर के करीब किले की नद्दी में जाकर छलांग लगा दी। मैंने थोड़ा डूब ही रहा था कि किसी ने ‘बचाओ, बचाओ’ का शोर मचा दिया और दो-तीन लोगों ने बीच नदी में कूदकर मुझे डूबने से बचा लिया। जबकि मैं उनसे कहता रहा, मुझे मत निकालो। मैं डूबना चाहता हूं। डूबकर लिखना चाहता हूं। किंतु किसी ने मेरी एक न सुनी।
मेरा पता पूछा और घर छोड़ दिया। घर पर अलग सीन बन गया। मुझसे डूबने (खुदकुशी) का कारण पूछा जाने लगा। परवरिश में कहीं कोई कमी रह गई, जैसे सवाल किए जाने लगे। बीच-बीच में गरियाया भी जाता रहा। खैर, जैसे-तैसे कर मामला सुलटा।
लेकिन मैं डूबकर लिखने के सुख से फिलहाल वंचित ही रह गया। डूब जाता तो डूबकर लिखने का रहस्य जान लेता। अन्य लेखकों को जब डूबकर लिखता हुआ देखता हूं तो मन ‘ग्लानि’ से भर जाता है। मुझे अब तक का अपना लिखा उनके आगे ‘तुच्छ’ लगने लगता है। कितने महान हैं वे लेखक जो निरंतर डूबकर लिख रहे हैं। सबसे अधिक कविताएं डूबकर लिखी जा रही हैं। कोरोना काल में भी कवियों का इस तरह डूबे रहना, प्रभावित करता है। मुझे पक्का विश्वास है कि एक दिन कवि कोरोना को भी डुबोकर ही दम लेगा।
मैंने तो घर पर भी ‘बाथ टब’ में डूबकर देख लिया। लेकिन उसमें वो ‘आनंद’ नहीं। वह डूबना मुझे ‘कृत्रिम’-सा लगा। उसमें डूबने में न कोई दिलचस्प ख्याल मन में आया न लिखने का रंग ही जमा। ऐसा लगा, दरियाई घोड़े की तरह पानी में पड़े हैं।
किले की नद्दी में गहराई है। उसमें डूबना मतलब जीवन-मृत्यु की उलझनों से पार पा जाना। मैंने सुन रखा है कि मेरे शहर के कई लेखक उसमें डूबकर ही महान लेखक बन पाए। उनकी लेखकीय महानता के चर्चे अब भी शहर में होते रहते हैं।
डूबकर मैं भी महान लेखक बन जाना चाहता हूं। डूबकर लिखने में जो मजा है, वो कुर्सी-मेज पर बैठकर लिखने में नहीं। डूबकर लिखने वाले को कभी कोई ‘डूब मरो’ जैसी गाली नहीं दे सकता। लेखन की थाह को पाना या नापना है तो डूबना पड़ेगा ही।
मैं हैरान हूं, उन लेखकों पर जो बिना डूबे ही लिख लेते हैं। उनकी किताबें तक बाजार में आ जाती हैं। इनाम-इकराम भी पा जाते हैं। अखबारों में कॉलम बंधवा लेते हैं। इतना सबकुछ बिना डूबे लिख लेना, कैसे संभव है भला! जरूर वे ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस’ तकनीक का इस्तेमाल करते होंगे।
अभी तो खैर मुझे डूबने से बचा लिया गया। लेकिन डूबकर लिखने के लिए एक दिन मैं जरूर डूबकर देखूंगा। चाहे मुझे यह कदम रात के अंधरे में ही क्यों न उठाना पड़े। उन सज्जन की कही बात मैं सच करके ही दम लूंगा। डूबकर लिखने से अगर मेरे लेखन में नयापन आ सकता है तो क्यों न डूबा जाए। एक बार डूब गया तो फिर मुझे दुनिया की कोई ताकत ‘महान लेखक’ बनने से नहीं रोक सकती।







