बनना नेता था, बन लेखक गया

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व्यंग: अंशुमाली रस्तोगी

मैं जब भी आईने में खुद को बतौर लेखक देखता हूं, तो मुझे घोर निराशा होती है। अपने चेहरे-मोहरे में कोई बदलाव नजर ही नहीं आता। वही मासूमियत, वही सच्चाई, वही आदर्शवाद झलकता मिलता है। जबकि इतना नफासत, नजाकत वाला जीवन मुझे कतई पसंद नहीं। मन में और चेहरे पर जब तलक ‘कइयापन’ न हो तो क्या फायदा! आजकल तो इंसान के शैतान होने का रास्ता ‘शातिराना हरकतों’ के दरमियान से ही निकलता है। यों तो शातिर लेखक भी खूब होते हैं किंतु अभी ये गुण मुझमें नहीं आ पाया है। इसका मुझे बेहद अफसोस है।

लेकिन मैंने लेखक बनना कभी नहीं चाहा था। न कभी लिखने, पढ़ने की चाहत ही पाली थी मन में। फिर पता नहीं कैसे, किस बहाने लेखक बन गया। जबकि मेरे परिवार में तो क्या पुरखों में भी कोई लेखक-वेखक नहीं हुआ। हां, बचपन में नेता बनने के सपने जरूर देखा करता था। अपने स्कूल-कॉलेज के ग्रुप में अक्सर नेतागीरी भी झाड़ लिया करता था। कुछ बिंदास टाइप के नेताओं (नाम न बताऊंगा) को अपना आदर्श भी मान रखा था।

खूब याद है, मोहल्ले से पार्षद-सभासद चुनाव के लिए खड़े होने वाले साथियों का चुनाव भी खूब लड़वाया। थोड़ी-बहुत नेताबाजी भी की उनके साथ। मगर खुद नेता बनने का चांस कभी नहीं मिला। कुछ तो घर-परिवार वालों का डंडा रहा तो कुछ इच्छाशक्ति की कमी भी रही।

पर आज जब अपने नेताओं के ठाठ-बाट देखता हूं तो सीना गर्व से चौड़ा हो लेता है। क्या जनता, क्या अफसर, हर कोई कैसा बिछा-सा नजर आता है उनके आगे। नेता जी, नेता जी… करके कितनी पूछ रहती है यहां-वहां।

सोसाइटी में तो उस बंदे को भी खासा मान-सम्मान मिलता है जो खुद नेता तो नहीं होता लेकिन अमुख नेताजी के संग 24×7 साए की तरह घुमता-रहता है। अपने नेताजी से हर काम को करवाने की गारंटी ले लेता है। नेताजी की चप्पल उठाने में भी गुरेज नहीं करता। क्या एक लेखक ऐसा कर सकता है?

लेखक बने रहकर क्या मिलेगा इतना सम्मान? उसकी किताबों और पाठकों के बीच भले ही मिल जाए पर जनता तो उसे पहचानेगी भी नहीं। अरे, इतने साल से लेखक बने रहकर मैंने कौन-सा तीर मार लिया? आलम तो यह है, मेरे पड़ोसियों-रिश्तेदारों तक को नहीं मालूम कि मैं लेखक हूं।

यह दीगर बात है, देश-समाज में जितनी छूट नेता को मिली होती है लेखक को नहीं। नेता स्वतंत्र है कुछ भी कहने-बोलने के लिए। यहां लेखक ने अगर कहीं कुछ टेढ़ा लिख दिया तो कुछ ही देर में उसकी शामत आ ही जानी है। नेता अपने बयान से ‘हीरो’ बन जाता है। लेखक अपने ‘लेखन’ से जीरो। अब इस हकीकत को मानो या न मानो आपकी मर्जी।

हालांकि वक़्त तो अभी भी नहीं निकला है मेरे नेता बनने का। देख भी रहा हूं आजकल युवाओं में नेता बनने की होड़-सी मची है। दो-तीन युवा नेता तो इन दिनों इतना छाए हुए हैं कि मीडिया उन्हें हाथों-हाथ ले रहा है। ये बात अलग है कि सबकी अपने-अपने फायदे की राजनीति है। पर नेता तो बन ही गए हैं न। यह क्या कम है!

बस जरा अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत कर लूं। फिर मैं भी बन ही जाता हूं नेता। लेखक बने रहने में कुछ नहीं धरा। केवल अपने वक़्त को बरबाद करना है। नेता बनकर कम से कम जग-प्रसिद्धि तो मिलेगी। है कि नहीं…!

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