दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का समापन हो गया। भले ही पुस्तकों को खरीदने वालों की संख्या वहां पहुंची संख्या के अनुपात में कम रही हो, मगर पाठकों का उत्साह सुखद अहसास दे गया। देश की राजधानी में पुस्तक मेला होने के कई फायदे मिलते हैं। बाजार, मीडिया की तव्वजो के साथ मिली कई सहूलियतें मेले को सफल बनाती हैं।
दिल्ली के आसपास के पुस्तक प्रेमी इसमें फिर भी किसी तरह भागीदारी कर लेते हैं, किन्तु दिल्ली से मीलों दूर बाकी राज्यों के पुस्तक प्रेमी जो देश भर में फैले हुए हैं, मन मसोस कर रह जाते हैं। पटना को छोड़ दें तो हिंदी पट्टी का कोई अन्य शहर पुस्तक मेले को उत्सव के तर्ज पर आयोजित नहीं करता। इस उदासीनता का खमियाजा छोटे शहरों के पुस्तक प्रेमियों को भुगतना पड़ता है।
आज इंटरनेट की सहज उपलब्धता का हवाला देकर भले ही इसे खारिज करने का प्रयास किया जाए। मगर इंटरनेट का एकाकी संवाद पुस्तक संस्कृति की जगह नहीं ले सकता। पुस्तक मेला लेखक-पाठक संवाद के लिए मंच देता है, वहीं पाठकों को नई पुस्तकों से रू-ब-रू भी करवाता है। छोटे शहरों में आयोजन ना करने को लेकर प्रकाशकों के अपने तर्क होंगे। उनमें कुछ व्यावहारिक भी होंगे। खासकर बाजार, और कुछ हद तक पाठकीय जागरूकता भी। फिर भी इस दिशा में छोटे ही सही, कुछ गंभीर प्रयास जरूर होने चाहिए। क्योंकि पुस्तक संस्कृति एक दिन में नहीं पनपती। उसे समय देना होता है; कुछ नये विचारों के साथ। जैसे फिल्म उत्सवों के साथ पुस्तक मेले का साझा आयोजन।
जाहिर है, इससे गंभीर दर्शक-पाठक एक मंच पर आएंगे। इसमें स्थानीय बुद्धिजीवियों की भी अहम भूमिका होगी। केंद्र-राज्य सरकारों को कर छूट के साथ कला-संस्कृति विभागों को प्रोत्साहन नीतियों के साथ आगे आना होगा। तभी छोटे-मंझोले शहरोें में पुस्तक मेले का सपना परवान चढ़ पाएगा। ध्यान देने वाली बात किताबों की बढ़ती कीमतों का भी है। प्रकाशकों को इसे संतुलित करना होगा, जिससे ये आम आदमी की जेब के बाहर ना जाएं। तल्ख सच्चाई है कि महानगरों में पुस्तकें पढ़ी कम, सजाई ज्यादा जाती हैं। अफसोस जिन्हें पढ़ने की तीव्र इच्छा होती है या जिनकी रुचि हैं, उन्हें उपलब्ध नहीं होतीं।
विशाल तिवारी







