कल की सोचे कौन ?

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गोदी में शिशु को लिए
पत्थर तोड़े मां
काम करे ना एक दिन
कैसे हो निर्वाह।
झोपड़ पट्टी धूप में
ना बिजली ना छांव
खाली करने का कभी
आ सकता फरमान।
व्यस्त है इतने आज में
कल की सोचे कौन
बीत रही है जिंदगी
अच्छा लगता मौन।
महलों में जो रहते है
क्या समझेंगे दर्द
आंधी पानी झेलते
ऐसे हम हर पल।
चर्चा उनकी हो रही
जिनका वैभव संसार
मजदूरी में सहज सब
विस्मय की क्या बात। – डॉ दिलीप अग्निहोत्री

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