ले आते हैं बादल मुझे, अन्दर तक भिगोने को

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ये पहाड़ अब
बेजान नहीं लगते
पुकारते हैं तुम्हारा नाम
मेरे पुकारने के साथ
मुझे उदास देखकर
देखते नहीं रहते
करते हैं सर्कस
और फिसल पड़ते हैं
 ऊँची चोटी से
बेशक ये साथ-साथ
नहीं चलते
पर मुझे देखते है
निश्चित ऊँचाई से
निहारते हैं उतने ही प्यार से
और जब मेरी रूह
तुम्हें याद करती है
ले आते हैं बादल मुझे
अन्दर तक भिगोने को
ये पहाड़ अब
बेजान नहीं लगते
सिखाते हैं दृढ़ता जीने की
और उदारता
जीवन के लिए,
तभीउगा लेते हैं
अनेक रिश्ते
अपनी पीठ पर
कभी फलों, कभी काँटों के
ये पहाड़ अब
बेजान नहीं लगते
https://youtu.be/eiwejKchw0g

चांद अगर रूठ गया तो हंसेगा कौन भला

भूल करते हैं सभी खुद को भुलाने के लिये.
भूल करते हुये कुछ भी नहीं सोचा जाता।
चांद अगर रूठ गया तो हंसेगा कौन भला.
घर के मासूम से कुछ भी नहीं पूछा जाता।

देखा जो तुम्हे पूरी ग़ज़ल भूल गया हूँ

मै पहली मुलाकात के पल भूल गया हूँ,
कब किससे हुई पहले पहल, भूल गया हूँ।
अब तक तो मुझे याद था हर शेर जुबानी
देखा जो तुम्हे पूरी ग़ज़ल भूल गया हूँ।।

मुझको कुछ देर और पढ़ने दे

एक शै लाजवाब लगती है
रोशनी बेहिसाब लगती है
मुझको कुछ देर और पढ़ने दे
तेरी सूरत किताब लगती है
https://youtu.be/Fqd2yDieFjs

मुस्कुराते हैं बाँहें फैलाए

देते हैं दिल को
खोलने का साहस
और बह जाते हैं झरने अपनी आँखों से
सिखाते हैं तमीज़
परायों को अपना बनाने की
यह जान कर भी
वो छल रहे हैं उनको
मुस्कुराते हैं
बाँहें फैलाए
और गोद में बैठाकर
सुनाते हैं लोरी
उस लोरी की
मिठास इतनी है
कि मैं हो जाना
चाहती हूँ पहाड़
वो पहाड़,
जो तुम्हारी याद में
साथ रहते हैं
हँसाते हैं मुझे,
सहना सिखाते हैं
अपनी पीठ पर
उगाते हैं रिश्ते
और आँसुओं को
 बेधड़क बहना सिखाते हैं
ये तमीज़, ये प्यार
ये साथ-साथ रहना
ये पहाड़ मुझे
ज़िन्दगी जीना सिखाते हैं
ये पहाड़ अब
बेजान नहीं लगते
प्रस्तुति: अनूप श्रीवास्तव

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