गांव की महकाती मिटटी: ‘महुआ वाली बाग’

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चरागाह वीरान हो चुके हैं। गाँव की डहर पगडंडियाँ जो कभी गोधूलि में रँभाती गायों की हलचल से गुलजार थे, आज उदास हैं। जहाँ कभी गोरुओं की घंटी के रुनझुन में ब्रह्मनाद झरता था, आज वे रास्ते साँय-साँय करते हैं। बाग का वह हिस्सा उछिन्नप्राय है जहाँ गाँव भर के गोरू चरागाह में जाने को जुटते थे। अब न गोबर की चिपरी है और न ही कान पे हाथ रख कर विरहा टेरता चरवाहा.. देखते देखते एक समूची दुनिया जाने कहाँ गुम हो गयी।
मन विगत में गोते लगाता है.. महुआ वाली वह बाग ! सारे गाय गोरू यहीं जुटते हैं आगे गोचर में जाने के लिए। एक एक कर चरवाहे चले आ रहे… हाँकते बोलते। बरफी, मगरू, निहाले, लहूरी सबसे पहले हाजिर होते। बहिरू बढ़ई की खैरी बड़ी हरहट है। गले में ठेंकुर न डालो तो काबू में ही नहीं आती। परसाल कुआर में करिया तेवारी के खेत में घुस गयी थी। बड़ी फजीहत हुई थी। तब से मजाल है कि बिना ठेंकुर के खूटा से छूटे। दूर से डहर में आती पतरकौ काकी दिखती हैं। सिर पर डलवा का बैलेंस बनाये उटंग साड़ी में तेज कदमों की धम धम के साथ बाग में चली आ रही हैं। वे एक अहम किरदार हैं इस चरवाहा चौपाल की। माटी के बरतन का धंधा है उनका। पूरे कुम्हार टोला में एक उन्हीं का आदमी चाक चलाता है। अवाँ में पकाने के लिए गोचर में उपले बनाने को गोबर इफरात मिल जाता है।
गाय भैंस पेड़ों की छाँव में झुंड बनाये पसरी बैठी हैं। बेतरतीब। कुछ उनीदी सी पगुराती हैं.. कुछ लोटने की मुद्रा में अलसाती। डाँगर कभी कभी ऊपर बैठी मक्खियों को भगाने के लिए चमड़ी को थरथरा देते या फिर कानों को झकझोरते। कहीं गायों  के कानों में किलँहटी कौवों की चोंच क्रीड़ा चल रही होती। चुन चुन के किलना किरौना निकालते। मुखिया की मुर्रा के थनों के पास से कूकुर जुओं की दावत में मगन है। कुछ किशोर वय के बछड़े आपस में किलोल कर रहे हैं। उनकी नूरा कुश्ती यूँ ही चलती रहती है..
ऐसा नहीं कि इस जमघट में सारे चरवैये ही होते; छुट्टियों के रोज पढ़वैयै भी आ जाते। चरवैओं पढ़वैओं में मधुर सखा भाव था। अच्छे का कोई गुमान या कमतरी का कोई हीन वोध न था। दूध पानी सा रिश्ता था। मिलजुल कर मस्ती होती। कोई सुझाता, “चलो सिया-डंडी खेलते है..” और देखते देखते सारे बालक बंदर सरीखे ‘सिपियहवा’ पर जा लदते। ‘सिपियहवा’ एक छतनार सा आम का पेड़ था। मानो कुदरत ने उसे सियाडंडी खेलने के लिए ही बनाया था। चारों ओर जमीन को छूती डालियाँ और धरती पर लेटा हुआ पूरा तना ! इतना ऊँचा न था कि गिरने से खास चोट लगे। सारे अपना करतब खेल इसी पर करते। जोखुआ बड़ा करतबी था। पाँव से डाल पकड़ के उल्टा लटक जाता था।
मौसम गुजरता रहता है। कितने चौमासे निकल गये, कितना जाड़ा बीत गया। कितनी बार महुआ कूचा, पर महुआ की बाग में दुबारा बसंत न आया। वीरान सी पगडंडियाँ हैं, उजड़ा उजड़ा सा गुलशन है। आज सिपियहवा के नीचे जंगल उग आया है और सारे बालक, बंदर से तरक्की कर बाबू बन गये हैं।
– अरुण कुमार तिवारी

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