ग़ज़ल: शमां की मानिंद सर पे आग को रक्खे हुये 

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शमां की मानिंद सर पे आग को रक्खे हुये

हसरतों के नाम ऐसी ज़िन्दगी जीते रहे।

नाम तो सागर रहा पर तिश्नगी जीते रहे।

बिजलियों की – आँधियों की हरकतें शामिल रहीं,
एक बादल की तरह आवारगी जीते रहे ।

दोस्तों की दोस्ती का यों ख़ुलासा भी हुआ,
महफ़िलों में फ़ब्तियां – छीटाकशी जीते रहे ।

याद आती आज मुझको गाँव की माटी बहुत,
शहर की अब तक हवाएँ सिरफिरी जीते रहे ।

ये कड़कती धूप जिसमें छांव का वनवास है,
उम्र भर कुछ यों ख़ुशी की बेरुख़ी जीते रहे ।

शमां की मानिंद सर पे आग को रक्खे हुये,
ज़िस्म तो गलता रहा पर रोशनी जीते रहे।

जबकि ख़िदमत में तिज़ोरी की लगा था आदमी,
हम यहाँ बस चंद ग़ज़लें – शायरी जीते रहे।


गीत: गीत गाता हूँ मैं

कट रहे हैं पंख मेरी कल्पना के

थक न जायें पाँव मेरी साधना के ,
मीत ! तुम बढ़कर तनिक दे दो सहारा ।

प्रेरणा की बाँह थामे , जब चला गन्तव्य को ,
जो रहे मुझ पर लुटाते स्नेह – सुख के द्रव्य को ,
घोंटते वे कण्ठ मेरी भावना का ,
बो रहे हैं बीज पथ में यातना के ।
थक – – – – – – – –

याचना के पुष्प लेकर प्रेम – मन्दिर को बढ़ा,
आँख में भर आँसुओं का अर्घ्य चाहा दूँ चढ़ा,
बुझ गये तब आरती के दीप हैं सब ,
रूठते हैं गीत मेरी वन्दना के ।
थक – – – – – – –

लुप्त होती जा रही है, आस – किरणों की चमक ,
है रही जाती, तिमिर का पार पाने की ललक ,
कामनाओं के कमल कुम्हला रहे हैं ,
कट रहे हैं पंख मेरी कल्पना के।
थक – – – – – – –

कमल किशोर ‘भावुक’