कौन जाने कब किस पर हो मेहरबान,
अपनी प्रसन्नता का गान रच देता वक़्त।
कण्टकों के देश हँसते सुमन के भवन,
तम के नगर में विहान रच देता वक़्त।
वेदना की वीथिका में वन्दना की रचनाएँ,
पथ -पत्थरों में भगवान रच देता वक़्त।
मान रच देता है विपन्नता की पंजिका में,
धूल पड़ी ज़िन्दगी महान रच देता वक़्त।
– कमल किशोर ‘भावुक’







