एक ग़ज़ल
कण्ठ तक जल में गड़ा , पर मुस्कुराता है कमल ।
तब कहीं संसार को इतना लुभाता है कमल ।
चूमकर किरणों ने, जाने क्या सुबह था कह दिया ,
शाम तक बिल्कुल नहीं पलकें झुकाता है कमल ।
ताल मिटते जा रहे हैं , अब कहाँ जाकर खिले ,
आँसुओं की झील में ही झिलमिलाता है कमल ।
पी गया है शान से जो गर्दिशों की धूप को ,
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा सबको सिखाता है कमल ।
साथ रोटी के शहीदों का बना सम्बल कभी ,
राष्ट्र की आराधना के गीत गाता है कमल ।
कमल किशोर ‘ भावुक ‘ – रचना – संसार से







