मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना,
लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना।।
भारत के जाने माने उर्दू शायर राहत इंदौरी साहब नहीं रहे. उनका निधन आज 11 अगस्त को इंदौर के हॉस्पिटल श्री अरविन्दों हॉस्पिटल में शाम 05:00 बजे हुआ। वह इंदौर के श्री अरविन्दों हॉस्पिटल में एडमिट थे। बताया जाता है कि कोरोना पॉज़िटिव होने के बाद वह अस्पताल में भर्ती थे. डॉक्टर विनोद भंडारी के अनुसार उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ।
उनका जन्म 1 जनवरी 1950 को हुआ था। खास बात यह कि वह उर्दू भाषा के पूर्व प्रोफेसर और एक चित्रकार भी थे। वह भारत के साथ अन्य देशों में भी बहुत पॉपुलर शायर थे। सही मायने में कहा जाये तो वह जन शायर थे। वह जब अपनी ग़ज़लें पढ़ते थे, तो सुनने वाले वाह-वाह कर उठते थे। सिस्टम वालों को राहत साहब कभी रास नहीं आये। इमर्जेंसी के दौर में भी इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ उन्होंने कई मर्तबा बयान दिये थे और इन दिनों भी देश में हिटलरशाही के ख़िलाफ़ उनके शेर रैलियों और जुलूसों में गाये जाते रहे हैं। राहत साहब का अंदाज़-ए-बयां अलग और दिलचस्प होता था. उनकी कुछ लाइनों के साथ श्रद्धांजलि अर्पित है –
दिल में आग, लबों पर गुलाब रखते हैं
सब अपने चेहरे पर, दोहरी नकाब रखते हैं
जितने अपने थे सब पराये थे,
हम हवा को गले लगाए थे
है तेरा क़र्ज़ मेरी आँखों पर
तूने सपने बहुत दिखाएँ
अगर ख़िलाफ़ है होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआं है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में
यहां पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
हमारे मुंह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुंह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है
मैं जानता हूं कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है
जो आज साहिब-ए-मसनद हैं कल नहीं होंगे
किरायेदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी हैं
सभी का ख़ून है शामिल यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है







