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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    इमरान खान का ‘शांति दूत’ वाला ख्याली पुलाव

    By March 22, 2019 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    file photo: परमेश्वर दत्त लाटा
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    अंशुमाली रस्तोगी

    ख्याली पुलाव पकाने में हमारा जवाब नहीं। जब दिल किया किसी न किसी मसले पर ख्याली पुलाव पकाने बैठ गए। सबसे ज्यादा ख्याली पुलाव खाली दिमागों में ही पकते हैं। कभी-कभी इतना पक जाते हैं कि जलने की बू तक आने लगती है। लेकिन पकाने वाले को जलने की बू से कोई मतलब नहीं रहता। उसे तो सिर्फ पकाने से मतलब।

    जैसे- पिछले दो-तीन दिनों से इस बात पर खूब ख्याली पुलाव पक रहे हैं कि इमरान खान सेना के इशारों पर काम करेंगे या अपनी मर्जी से। भारत को इमरान खान से आपसी मसलों को सुलझाने में दिलचस्पी लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए।… साथ-साथ मेरे कान तो यह सुनकर भी खूब पक लिए हैं कि इमरान खान का अपना कोई वजूद नहीं, वो पाकिस्तानी फौज की कठपुतली हैं।

    बैठे-ठाले ख्याली पुलाव पकाने वाली को मैं दिल से दाद देता हूं। उनके हत्थे कोई भी मसला चढ़ना चाहिए बस फिर देखिए वे पुलाव को घोटकर खिचड़ी न बना दें।

    किस्म-किस्म के ख्याली पुलाव तब पक रहे हैं जब इमरान खान के हाथों में पाकिस्तान पर शासन की बागडोर अभी पूरी तरह से आई नहीं है। और इधर पुलवामा हमले के बाद अभी तो सबकुछ हवा में जुमलों की मानिंद तैर रहा है। अपने पहले भाषण में इमरान ने अभी तो अपनी इच्छाएं ही जाहिर की हैं कि वे पाकिस्तान को शांति दूत वगैरा – वगैरा जैसा क्या बनाने का ख्वाब रखते हैं। चीन, अफगानिस्तान, अमेरिका, भारत आदि के साथ किस प्रकार के रिश्ते रखना चाहते हैं। पर आगे का सीन तो उनके कुर्सी पर बैठने के बाद ही बनेगा।

    मगर भाई लोग हैं कि ख्याली पुलाव को पका-पकाकर उसे पतली दाल सरीखा बना डाला है। यह तो लगभग वही बात हो गई कि शादी अभी ढंग से हुई नहीं कि खुशखबरी सुनने की बेताबी सिर चढ़कर बोलने लगी।

    अमां, अगले को अभी ढंग से गद्दी पर बैठने तो दो। कामधाम अपने हाथों में लेने तो दो। ऊंट को पहाड़ के नीचे आने तो दो। प्रधानमंत्री की कुर्सी का पहला-पहला स्वाद चखने तो दो। दो बातें अपनी, चार बातें आवाम की, दस बातें सेना की सुनने तो दो। राजनैतिक और डिप्लोमेटिक मसलों का क्या है, ये तो जन्म-जिंदगी भर के रोग हैं। इनसे छुटकारा पाना नामुमकिन है जनाब।

    यों भी, पाकिस्तान का इतिहास गवाह है वहां सरकार या प्रधानमंत्री अपनी मर्जी के नहीं सेना की तानाशाही के गुलाम होते हैं। वहां तो पत्ता भी सेना के आदमियों से पूछे वगैर नहीं हिलता। अब तक जाने कितने ही शासक आए और चले गए परंतु सेना का रुतबा जैसा था वैसा ही रहा।

    पाकिस्तान में सरकारें हमारे हिंदुस्तान जैसी लोकतांत्रिक सोच वाली थोड़े न होती हैं। वो तो बस दुनिया को दिखाने भर के लिए होती हैं कि देखो, हमारे यहां भी एक चुनी हुई सरकार है। जबकि उसे चुनता और गुनता कौन है सब जानते हैं।

    मैं तो कहता हूं, अच्छा ही हुआ जो इमरान खान पाकिस्तान के कप्तान बन लिए। बहुत लंबे समय से वे इस जुगाड़ में थे भी कि कब वो दिन आएगा जब मैं पाकिस्तान का वजीरे-आलम कहलाऊंगा। अब जाकर आया है वो दिन।

    हालांकि इमरान राजनीति की पिच पर बहुत लंबे वक्त से खेल रहे हैं। मगर फिर भी राजनीति की पिच क्रिकेट की पिच से काफी अलहदा होती है। खेल में तो आपको दस-ग्यारह खिलाड़ियों को ही संभालना होता है पर राजनीति की पिच पर तो देश और विदेश के संबंधों को साथ-साथ संभालना पड़ता है। राह कठिन तो है पर है जोरदार। लुत्फ यह है कि नेताओं के तो पांच साल खेल-खेल में कट जाते हैं।

    कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि मियां इमरान खान अपनी शादी, अपने परिवार को तो संभाल न पाए, इतना बड़ा मुल्क क्या खाक संभाल पाएंगे। बड़े ही भोले हैं लोग। समझते ही नहीं। शादी और मुल्क को संभालने में फर्क होता है। शादी के साथ तो हमेशा ‘तू नहीं और सही’ का ऑप्शन रहता है। किंतु मुल्क के साथ ऐसा सीन नहीं। वहां तो बागडोर एक दफा हाथ से फिसली तो फिर इतनी आसानी से दोबारा हाथ न आती। मियां नवाज शरीफ को ही देख लो, मुल्क की अच्छी-खासी डोर उनके हाथों में थी पर सेना ने उनसे छीनकर इमरान के हाथों में दे दी। और फिर शादी-ब्याह उनका जाति मसला है, किसी को उससे क्या। लोगों हैं लोगों का तो काम ही है कहना।

    सुना तो यह भी है कि उनकी तीसरी बीवी ने उनके पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होने की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। सुना है, सियासत के मसलों में इमरान अपनी तीसरी बीवी से सलाह अवश्य लेते हैं। अच्छा है। एक हमारे यहां के पति हैं जो सियासत तो दूर रोमांस पर भी कोई सलाह अपनी बीवियों से न लेते। घोर अन्याय। डर भी बना रहता है न उन्हें।

    बहरहाल, जिन्हें शौक है वे मन से इमरान खान पर अपने ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त हैं। चलिए इस बहाने वे कुछ तो कर रहे हैं। खाली तो नहीं बैठे हैं न। खाली दिमाग वैसे भी शैतान का घर होता है। ख्याली पुलाव पकाने में भी थोड़ी-बहुत बुद्धि तो खर्च होती ही है।

    बाकी उम्मीद पर दुनिया कायम है ही। इमरान खान से आशा नहीं, उम्मीद ही रखें कि वे सेना के शिकंजे को तोड़ अपने मुल्क के लिए कुछ बेहतर कर पाएं! भारत भी उन पर निगाह और उम्मीद दोनों बनाए रखे है।

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