सरल अभिव्यक्ति तभी प्रभावी होती है जब वह सत्य के अधिकाधिक निकट हो

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आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं…., ऐ भी जरा देख के चलो…जैसे अन्य गीत लिखकर लोगो के दिलों पर अपनी खास पहचान बनाने वाले नीरज जी अब हम लोगो के बीच नहीं हैं लेकिन वह अब भी कहीं न कहीं किसी न किसी गीत में हम लोगो के बीच हमेशा मौजूद रहेंगे। गोपालदास नीरज ऐसी ही शख्सियत थे जिन्होंने गंभीर लोगों को बहुत प्रभावित किया।

वैसे तो जन्म मृत्यु जीवन का शास्वत नियम है लेकिन कभी-कभी समाज में कुछ ऐसी शख्सियत भी होती हैं जिनके बारे में सहसा विश्वास ही नहीं होता कि वह हमारे बीच अब नहीं है । इनके व्यक्तित्व की विलक्षणता और गुणों की उत्कृष्टता सबसे अलग होती है, लेकिन इनको सभी के गले उतार देती हैं कुछ इस तरह कि वे लोगों के दिलों दिमाग पर छा ही नहीं जाते हैं, बल्कि दशकों तक राज करते हैं ।

साहित्य और काव्य ऐसे क्षेत्र हैं। जिनको सुनने पढ़ने वाले सभी वर्गों में होते हैं उनकी अपनी- अपनी पसंद होती है, लेकिन जब ऐसी रचना सामने आए जो सभी का समान रूप से आनंदित करें । तो यह उस रचना एवं रचनाकार की उत्कृष्ट प्रतिभा का परिचायक होती है, उसे विलक्षण बनाती है। सबसे अलग करती है गोपालदास नीरज ऐसी ही शख्सियत थे । जिनको काव्य प्रेमी समान रूप से चाहते थे। रचनाकार की विशेषता इसमें होती है कि अपने भावों को समाज के कितने निकट वह ला सकता है। यह विशिष्टता नीरज में इतनी जबरदस्त थी कि इसका उदाहरण अन्य रचनाकारों में नहीं मिलता।

फिल्मी गीत हो या साहित्यिक रचनाएं समान रुप से समाज के सभी वर्गों में सराही जाती थी अपनाई जाती थी उससे भी बड़ी बात यह है कि मोहब्बत और रूहानियत के अनूठे चितेरे नीरज की विशिष्टता कि यह उपस्थिति महीने दो महीने या कुछ वर्षों के लिए नहीं। बल्कि दशकों तक सशक्त रूप से रही है माना यह जाता है कि तीन चार पीढ़ियों के लोग उनकी रचनाओं को सुन पढ़ कर आनंदित होते रहे तब रचना तभी विशिष्ट बनती है । जब विषय में डूबकर भावनाओं को तराशकर उसकी प्रस्तुति की जाती है । इसमें कोई बनावट नहीं होती कोई स्वार्थ नहीं होता बस अभिव्यक्ति होती है। सरल अभिव्यक्ति तभी प्रभावी होती है जब वह सत्य के अधिकाधिक निकट हो स्वाभाविक हो तथा सभी का प्रतिनिधित्व करती हो ।

कबीर दास इसी सरल किंतु सत्य अभिव्यक्ति के कारण करीब तीन शताब्दी बाद आज भी समान सम्मान के साथ पढ़े जाते हैं विषय अलग धर्मों का भले हो लेकिन जब वह जीवन के निकट होगा । तभी उसने स्वाभाविकता आएगी । नीरज ऐसे ही सरल स्वभाव लेकिन सशक्त अभिव्यक्ति के बेमिसाल रचनाकार थे । निश्चित रूप से उनके जाने के बाद हिंदी के रचना जगत में शून्य होगा, जिसको भर पाना आसान भी नहीं कहा जा सकता।

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