मेरी बात: अंशुमाली रस्तोगी
साहित्य में अब सबकुछ ‘लाइव’ ही बोला-कहा जा रहा है। यहां लिखने का झंझट नहीं। पढ़ने की मगजमारी नहीं। हां, कमेंट में आने वाली ‘बधाई’ और ‘वाह’ एवं ‘नमस्कार’ को पढ़कर ‘आत्ममुग्ध’ होते रहिए। लोग सुनने से अधिक व्यस्त रहते हैं कमेंट करने में।
अच्छा, एक बात पूछने का मन करता है कि लाइव आकर अब तक कितने साहित्यकार कितने पाठकों का भला कर चुके हैं? साहित्य में कितनी क्रांतियां ला चुके हैं? लेखन व पाठक को कितना और कहां तक बदल पाए हैं? या प्रगतिशील बना पाए हैं?
हकीकत यह है कि यहां कोई किसी को नहीं पढ़ रहा। जो पढ़ा जा रहा है वो या तो व्हाट्सएप पर या फेसबुक की दीवारों पर। किताबें फेसबुक पर प्रचार के काम आ रही हैं। जब कवर पेज लगाकर ही हजारों लाइक्स और कमेंट्स से झोली भर रही है फिर किताब पढ़कर क्या करना है!
लाइव आ-आकर लेखकों-साहित्यकारों ने साहित्य, पाठक और लेखन को ‘तबाह’ कर दिया है। हर कोई आत्मप्रचार और आत्ममुग्धता का जाम पी खुमारी में पड़ा रहना चाहता है।







