कानपुर-208001, 2019
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इन्हीं घनी-गंदी गलियों में खो गए मेरे पक्के दोस्त
उन्हें ढूँढ़ों, उन्हें पुकारो…
वे अब नहीं हैं इधर
उनके बारे में बताओ
ताकि अपने बारे में बताने की
ज़रूरत न पड़े
अपने अधटूटे और अनघढ़ घरों को छोड़कर
इन्हीं अँधेरी गलियों में
बिजली के तारों पर दौड़ते बंदरों की तरह
वे गिरे, घायल हुए और पार भी…
जोखिमों से भरे थे उनके कार्यभार
रिक्शे उनका भार उठाए
उन्हें उनकी गलियों से कुछ दूर ले गए
जहाँ से जाया जा सकता था नए बने नगर में
और फिर वहाँ से सब कुछ भुलाकर और आगे…
- अविनाश मिश्र







