मंगल पर कदम और कुंडली का भ्रमजाल

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अंशुमाली रस्तोगी
एक लेख में पढ़ा था- ‘कुंडली की बात अगर आती भी है तो मां-बाप को इसकी फिक्र करने की क्या जरूरत है? इसे मिलाने या न मिलाने का फैसला क्यों न शादी करने वालों पर ही छोड़ दिया जाए?’
अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो यह फैसला, निश्चित ही, न केवल हमारे बल्कि समाज के लिए भी बड़ी मिसाल साबित होगा। दरअसल, कुंडली या गोत्र मिलान की चाह दो शादी करने वालों को इतनी नहीं होती, जितना उनके मां-बाप को। चाहे लव-मैरीज हो या अरेंजड कुंडली का दखल दोनों जगह रहता है। बिना कुंडली के शादी करने या करवाने को हम ‘पाप’ मानते हैं। लड़के-लड़की के बीच चाहे 36 गुण मिलें या 30 मगर गुण अवश्य मिलने चाहिए। गुण न मिलने पर हम लड़के-लड़की को एक-दूसर के प्रति ‘अभिशाप’ समझ लेते हैं। अगर मामला दोनों में से किसी के ‘मंगली’ होने का हो तब तो कहना ही क्या! फिर तो ऐसे-ऐसे बेसिरपैर के तर्क पेश किए जाते हैं, जिन्हें सुनकर लगता ही नहीं कि हम 21वीं सदी के बेहद आधुनिक तकनीकी युग में रह रहे हैं। या, हमने अभी हाल मंगल पर कदम रखा है।
क्या कुंडली का महत्त्व दो दिलों-रिश्तों के प्रेम से भी बढ़कर है? मंगली होने के दोष निवारण के लिए कैसे और क्या-क्या धार्मिक-अंधविश्वासी उपाय किए जाते हैं, इसे हम कुछ साल पहले अभिषेक और एश्वर्या के विवाह के दौरान देख चुके हैं। ऐसा ही कुछ अक्सर हमें सुनने-पढ़ने को भी मिलता रहता है।
क्या आपको नहीं लगता कि जैसे-जैसे हम नई सदी की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे और अधिक कूपमंडूक-अंधविश्वासी होते चले जा रहे हैं। कोई या कैसा भी वैवाहिक कार्य बिना कुंडली और बिना धार्मिक रीति-रिवाजों के संपन्न ही नहीं होता। सबसे हास्यास्पद यह है कि कोई ज्योतिषि यह नहीं कहता और न किसी कुंडली में यह लिखा होता है कि ‘दहेज’ का लेने-देने दोनों पक्षों के बीच नहीं होना चाहिए। जितनी जड़ परंपरा कुंडली की है, उतनी ही दहेज की भी। लेकिन बड़े-बड़े पढ़े-लिखे परिवार इस बाबत मौन साधे रहते हैं। उनका लक्ष्य केवल कुंडली मिलान होता है, दोनों के बीच प्रेम कितना रहेगा, इस पर शायद ही कोई विचार करता हो।
जिन्हें ऐसा लगता है कि विवाह के बीच प्रेम से कहीं ज्यादा मायने कुंडली रखती है तो गलत है। आपसी प्रेम और विश्वास ही विवाह का आधारस्तंभ है नाकि कुंडली। कुंडली हमारे समाज का ‘यथास्थितिवादी विकार’ है। यह संबंधों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करता है। कुंडली कलचर ने सबसे ज्यादा नुकसान लड़कियों का किया है। जिस लड़की की कुंडली नहीं मिलती, उसके खिलाफ तरह-तरह के सवाल उठने लगते हैं। समाज में न जाने ऐसे कितने ही अच्छे-अच्छे रिश्ते इस कुंडलीबाजी के चक्कर में बनते-बनते टूट जाते हैं।
निरंतर तकनीकी रूप से आधुनिक होते समाज के बीच कुंडली की परंपरा ‘कलंक’ समान है। ऐसा आधुनिक समाज भी भला किस काम का, जिसमें आधुनिकता कपड़ों और तकनीक में तो नजर आए मगर परंपरागत रूढ़ियां बरकरार रहें। जहां प्रेम से ज्यादा जरूरी कुंडली को माना-समझा जाए। जहां सिर्फ गुणों के आधार पर रिश्ते बने और न मिलने पर तोड़ दिए जाएं।
एक तरफ हम मंगल पर जा पहुंचे हैं और दूसरी तरफ अभी भी कुंडली के ‘प्रपंच’ में उलझे हुए हैं। इस बात की क्या ‘गारंटी’ है कि कुंडली मिल जाने के बाद भी, तलाक नहीं होता? या पारिवारिक और वैचारिक मतभेद नहीं पैदा होते? केवल गुण-गोत्रों का मिलान ही विवाह की दशा-दिशा तय नहीं करता। यह प्रेम और विश्वास के आधार पर तय होती है। विवाह का भविष्य न ज्योतिषी बता सकते हैं या कोई कुंडली।
कुंडली जैसी शोशेबाजियों के खिलाफ समाज के आधुनिक और प्रगतिशील परिवारों को आगे आना होगा। समाज के भीतर ऐसी मिसाल कयाम करनी होगी, जिसमें ऐसी रूढ़ियों-धार्मिक आस्थाओं को सिरे से खारिज किया जाए। जहां विवाह के मायने कुंडली से नहीं प्रेम से तय हों।
बेशक ऐसे समाज का होना-बनना थोड़ा मुश्किल है मगर नामुंकिन नहीं। युवा पीढ़ी अपनी प्रगतिशील सोच-विचार के आधार इन रूढ़ियों से खुद अपने परिवारों को बाहर निकाल सकती है। नहीं तो हम ऐसे ही कुंडली के भ्रम में उलझ ज्योतिषियों की दुकानें मोटे दामों के दम पर चलाते-चलवाते रहेंगे।

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