जिनसे कुछ उम्मीद थी
बन्द हुए वह सभी द्वार।
सावन को भी देख लिया
होती रही उधर बरसात
सूखा इधर
तरसता मन
आई नहीं इधर बौछार।।
अपना भ्रम भी दूर हुआ
व्यस्त बहुत वह समय कहाँ
बदल चुकी है दुनिया उनकी
घेरे में दूरी है कितनी
भव्य हुआ कितना संसार।
बन्द हुए वह सभी द्वार।।
– दिलीप अग्निहोत्री







