दर्पण

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अब बहुत दिनों के बाद
देखता हूं दर्पण
क्योंकि वह झूठ नहीं
बोलता है, निष्ठुर।।
बता देता है
चेहरे की झुर्रियां
बढ़ती उम्र,बालों की रंगत
उदासी का मंजर।
लेकिन यही तो है
प्रकृति का चक्र और
सहज परिवर्तन
न भय न संशय
शेष है समर
चलना हर पल
वह भृमित नहीं करता है।
दर्पण झूठ नहीं बोलता है।।
         
– दिलीप अग्निहोत्री

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