जर्जर कश्ती

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जर्जर कश्ती पर सवार
एक से बढ़कर एक तीरंदाज।
अपनी अपनी चिंता में बेहाल
न नाविक, न मंजिल न कमान
फिर भी जंग का ऐलान
कोई नहीं जानता कब तक
रहेगा साथ और कब
छोड़ देगा मझधार
इन्हीं में कोई कर सकता है
दूसरे को डुबाने का प्रयास
स्वार्थ ही स्वार्थ बेहिसाब
तार तार पतवार
फिर भी पार लगने का विचार
जर्जर कश्ती पर सवार।।
                 
– दिलीप अग्निहोत्री

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