अंशुमाली रस्तोगी
प्रियंका चौपड़ा के किसी अंगरेजी पत्रिका में छपे ‘नंगी पीठ’ युक्त ‘कवर पृष्ठ’ पर ‘टि्वटर’ पर बहस गर्म है। प्रतिक्रियाएं समर्थन में कम ‘विरोध’ में अधिक हैं। स्वाभाविक है, ऐसे उत्तेजनात्मक फोटो को देख कौन भलामानुष अपने कथित जज्बातों पर नियंत्रण रख पाएगा। कह रहे हैं, ‘प्रियंका को शर्म आनी चाहिए। उसे माफी मांगनी चाहिए। ऐसा लिबास एक हिंदुस्तानी औरत को शोभा नहीं देता।’ आदि-आदि।
मैं तमाम प्रतिक्रियाएं पढ़ ‘हंस’ रहा हूं। उन सभ्य लोगों पर नहीं बल्कि उनकी ‘असभ्य सोच‘ पर। प्रियंका को अपनी ‘नंगी पीठ’ दिखानी चाहिए या नहीं दिखानी चाहिए तो अब ये चंद लोग तय करेंगे। वे बताएंगे प्रियंका को कि वो क्या पहने और क्या न पहने।
पता नहीं, कुछ लोग ठेकेदार बनकर सबकुछ अपने हाथों में ले लेना चाहते हैं। उन्हें लगता है, औरत सिर्फ उनकी मर्जी से चले। कपड़े पहने। हंसे। बोले। चले। घूमे-फिरे। सबकुछ वो वही करे, जो वे चाहते हैं। लेकिन क्यों? नंगी पीठ दिखाने पर जब प्रियंका या उसके पति को एतराज नहीं तो लोग कौन होते हैं, अपनी राय पेश करने वाले।
फिर प्रियंका जिस प्रोफेशन में है, वहां ये सब आम है। पीठ दिखाएं या क्लिवेज सब चलता है। यह निर्भर देखने वाले पर करता है, वो किस निगाह से देख रहा है।
थोड़ा पीछे लौटें। पिछले दिनों ऐसा ही एक विवाद प्रियंका के भारत के प्रधानमंत्री के साथ एक बातचीत में स्कर्ट पहनकर बैठने को लेकर भी उठा था। तब भी प्रियंका को अपनी इस कथित असभ्यता के लिए बहुत कुछ कहा गया था। प्रधानमंत्री के आगे ‘नंगी टांगे’ नहीं दिखानी चाहिए थीं। आदि-आदि।
समाज में होते हैं कुछ लोग जिनकी जुबान पर हर वक्त ‘चुल्ल’ कायम रहती है। उन्हें लगता है कि जो वे कह रहे हैं केवल वही ‘सही’ हैं, बाकी सब ‘बकवास’। उनको प्रति-उत्तर देने का सबसे बढ़िया तरीका है कि उनकी सुनी ही न जाए। दिल-दिमाग जिसका गवाही दे, करें। प्रियंका ने भी वही किया और ठीक किया।







