साहित्यिक मदारी
साहित्य की दुनिया मे कुछ मदारी होते हैं और कुछ बन्दर भी! अक्सर मदारी ही बंदरों को नचाते रहते हैं पर बन्दर भी कभी कभी मदारियों को नचा देते हैं । खैर ! साहित्य को लोग आईना बताते हैं तो बात फिलहाल आईने से ही शुरू करते हैं।
कुछ लोग जो आईने में अपना अक्स नहीं देख पाते हैं वे भी उसके सामने खड़े होकर दूसरों का चेहरा तलाशते रहते हैं । अब तक यह बीमारी राजनीतिक क्षेत्र में ही थी लेकिन अब इसकी लपेट से साहित्य भी बाहर नहीं है। लग यह रहा है कि जो लोग बिना कुछ किये धरे ही सब कुछ पा लेना चाहते हैं,उनकी जमात भले ही कितनी ही छोटी क्यों न हो पर हद से बेहद तक ऐंठी हुई है।
लोकतंत्र की बैसाखी लगा कर ऐसे तमाम सफेदपोश लोगों की बाढ़ आ जाना स्वभाविक है जो बिना मेहनत मजूरी किये हाड़ तोड़ मेहनत करने वालों से घर बैठे दुगनी चौगुनी उपलब्धि हड़प लेना चाहते हैं। पूरे हक के साथ । इस वायरस ने साहित्य को भी अपने शिकंजे में कस लिया है ।
साहित्य में ऐसे नामावरों की कमी नहीं है जो साहित्य की हर उपलब्धि को टीका बनाके अपने माथे पर जड़ लेना चाहते हैं । वे बिना पढ़े ही प्रेमचंद, अज्ञेय, परसाई, शरद जोशी,नामवर सिंह को पीछे छोड़ देना चाहते हैं । बाकी की बिसात ही क्या है?
वे सोशल मीडिया को भुनाने के खेल में माहिर हैं । गूगल को वे बाएं हाथ से नचा सकते हैं और शायद इसीलिए उनके पास अधकचरी जानकारी है और सम्भावना का कालम खाली है।
बेचारे करें भी तो क्या ? वे वर्षों का फासला चंद मिनटों में तय कर लेना चाहते हैं । चंद दिनों में अपने जोड़ तोड़ से वह सब हथिया लेना चाहते हैं जिसको पाने में उनके पुरखो(लेखकों )को पूरी उमर लग गई । वे कलम
घिसते रहे पर ये क्यों घिसें?
कलम साधने का ज़माना गया। अब सोशल मीडिया, फेस बुक, व्हाट्सप, ट्वीटर का समय है सारी जद्दोजहद ऑन लाइन होती है जो चंद पलों में पूरी दुनिया को बदल देती है । एक किशोर युवती सिर्फ आंख मार कर लाखों फालोवर अपनी झोली में डालने की क्षमता रखती है फिर बरसों की रगड़ घिस करने या मगज़मारी करने की जरूरत भी क्या है ?
साहित्य क्या चीज है ? सोशल मीडिया के वे आभारी हैं और इसी के दम पर वे साहित्य के परिवेश पर भी आभारी हैं।
इसी के चलते साहित्य की जमात में ऐसी तलछट की भरमार है । अभी तक अध्यापक और पत्रकार ही साहित्य में अपना पैदाइशी हक मानते थे लेकिन वे दिन लद गए जब खलील मियां को ही फाख्ते उड़ाने का हक था अब तो हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा जिसकी टेंट भारी हो किसी भी क्षेत्र में अपनी हनक बिठा सकने की क्षमता रखता है। वेतन आयोग की मेहरबानी से सेवानिवृति नौकरशाहों की उपस्थिति तो केकड़ों को भी शर्मा रही है।
जो दावा वे अपने सेवाकाल में नहीं कर पाए अपने संस्मरण लिखकर साहित्य के क्षेत्र में अपनी हनक बिठा रहे हैं।
लगता है अब साहित्यिक समारोहों, संगोष्ठियों,परिचर्चाओं के दिन लद गए। अब साहित्य की दशा और दिशा के सम्बंध में सारा विमर्श आन लाइन होना ही मुफीद है । सोशल मीडिया के मनसबदार जबरन साहित्य के सरपंच की चौकी हथिया लेने पर उतारू हैं । जहां वे नहीं हैं उनकी माने तो वे जगहें उनके अनुसार सही नहीं हैं । साहित्यिक लेखे जोखे से उनको कोई लेना देना नहीं है।
हालांकि सोशल मीडिया से भी वे पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं। उनकी निगाह अन्य विकल्पों पर भी है। वे किसी के मोहताज नहीं हैं। उनका मानना है कि पिछली पीढ़ी में जो भी बचे खुचे हैं इनकी पीठ थपथपाने को बाध्य हैं।
कभी कभी लगता है कि क्या यह सिर्फ चाय के प्याले का तूफान मात्र नहीं है जो सिर्फ बहकना जानता है ।इसमे दोष हमारा भी है अधकचरा ज्ञान कहीं बन्दर के हाथों का उस्तरा तो नहीं बनने जा रहा है। यह समझ कब आएगी ?आएगी भी या नहीं इस प्रश्न को अभी अनुत्तरित ही रहना है क्योंकि प्रश्न काल बीत चुका है ।
ज़मीन कभी खाली नही रहती अगर उसमे कुछ न बोया जाए तो खर पतवार तो उगते ही हैं जंगली पौधे भी अपना वजूद दर्शाने लगते हैं । अच्छी खासी बस्ती को जंगल बनने में देर नहीं लगती। जब हमने नई पीढ़ी में संस्कारों के बीज बोए ही नही उल्टे अपनी अहमन्यता में डूबे रहे । सूर, तुलसी, कबीर, रहीम पर हमने अतीत का साया डाल दिया। मतिराम, घनानंद को आउट ऑफ डेट समझ लिया। प्रसाद , पंत, निराला, महादेवी को किनारे रख दिया। राहुल सांस्कृत्यायन कौन थे ? पूछने पर हम मुंह बा देते हैं। ऐसे में अगर कोई युवा लेखक बोलता है ‘आप कहते है इनको पढ़ो उनको पढ़ो तो यह बताइये हम पढ़ते ही रहेंगे तो लिखेंगे कब’ ? इसमे उस बेचारे की गलती क्या है। जब लाइक और कमेंट ही उपलब्धियों के तराजू हैं तो सारी चिन्ता बेमानी है क्योंकि साहित्य की मैजूदा पीढ़ी यह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि वह चुक गयी है।
साहित्यिक सोशल मीडिया के बैनर पर दिए गए एक पंचसितारा भोज में जब एक वरिष्ठ साहित्यकार के दांत बजने लगे तो एंकर दौड़ कर आया -‘सर! क्या चावल में कहीं कहीं कंकड़ हैं ? वरिष्ठ साहित्यकार हिचकिचाते हुए बोला-‘नहीं- नहीं कही कही चावल भी है’ जो कंकडों का मज़ा खराब कर रहा है । इस टिप्पड़ी पर चंद लोग ही मुस्करा सके क्योंकि वह “बैक डेटेड साहित्यकार” था ।
इस साहित्यिक फफूंदी को नजरंदाज करके नहीं जिया जा सकता। इस पर गंभीरता से सोचना होगा। साहित्य का सरोवर कभी स्वच्छ हुआ करता होगा पर अब पूरे सरोवर को जलकुंभियों ने ढक रखा है और उसे फिलहाल बाहर निकाल फेंकने की कूबत किसी में नहीं है ।
– अनूप श्रीवास्तव की वॉल से







