Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 627 कोई तो बांट ले ये उदासी ये सितम। रुक गए है दिवस के सारे पहर सूझता कुछ भी नहीं जाएं किधर जिधर भी देखो समर चारों तरफ बढ़ रहा है ज्वार चक्रवाती कहर।। – दिलीप अग्निहोत्री