शहर मतलबी है चलो गांव चलते हैं 

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चलो एक दिन वट की छावं चलते है
शहर मतलबी है चलो गांव चलते हैं
यहां बारिश में लोग कूड़ा बहा देते हैं
मेरे गांव आज भी बारिश में नाव चलते हैं
तुम जख्म सहलाने की बात करते हो
यहां लोग मरहम में भी दांव चलते हैं
फकीरों में फकीरी नहीं तेरे शहर में
यहां जिंदादिलों में घाव चलते हैं
चलो खेत ,अमरुद ,अंगूर , बाट जोहते हैं
अब जामुन के पेड़ की और पांव चलते हैं
साईकिल से चलते हैं गाड़ी घर छोड़ देते हैं
चलो कच्चे रास्तों से चलो पेड़ की छांव चलते हैं
गुल्ली डंडा , माचिस ताश , कंचे गोली देखी हैं
तेरे शहर औकात के हिसाब से चाव चलते हैं
यहां चीजें पड़ोसी से बांट ली जाती है
तेरे शहर पानी की बोतलों के भाव चलते हैं
थक गए हैं शहर की तरक्की देखकर
चलों फिर से अपने गांव चलते हैं
– राकेश
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