सारा जग जाने क्यूँ बैरी सा है..

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तेरी यादें

चाहत हिमालय, मोहब्बत सागर..
तेरी यादों से ही ये भादव-सावन..
तू जैसा भी है तू है मेरा जीवनऽऽ हाँ! मेरा जीवन..
आज दूर तू जो परदेश सा है…
सारा जग जाने क्यूँ बैरी सा है..
आ ऽऽ जा कि.. लगा के गले से तू मुझे कर दे पावन…
चाहत हिमालय, मोहब्बत सागर..
तेरी यादों से ही ये भादव-सावन..
तू दिल की धड़कनों में..साँसों की लय में..
तू राधा-कृष्ण के प्रेम की जय में…
आ ऽऽऽ जा कि..  बाहों में लेकर मुझे कर दे पावन..
चाहत हिमालय, मोहब्बत सागर..
तेरी यादों से ही ये भादव-सावन..

प्रेम का राग

तुझसे ही मेरे सुबहो-शाम।
तुझसे ही चलती ये साँस।।
तू मेरा ख्वाब तू सबसे खास।
तू वादियाँ पहाड़ों की,
तू वहाँ की खूबसूरत शाम।
मेरी धड़कनों में बज रही,
एक तेरी चाहत की ही साज।।
तुझसे ही मेरे सुबहो-शाम…
तुझसे ही चलती ये साँस…
कह रहा था बहता दरिया,
कह रहा था वक्त का पहिया।
तू आसमाँ सा मेरे साथ,
तुझसे ही यहाँ प्रेम का राग।।
फूलों और भौरों की होती ये बात।
तू प्रेम है तू शुकून है,
तुझसे ही ये जीवन प्रवाह।।

अनोखी मोहब्बत

जाने क्यूँ तुम ज़िंदगी सी लगती हो।
दूर हो फिर भी दिल में धड़कती हो।।
तुमसे ही होते हैं दिन और रात मेरे।
तुम अकेले ही सारी क़ायनात लगती हो।।
मोहब्बत का ये कैसा रूप है ‘राहुल’।
कभी मैं तुम-सा लगता हूँ,
कभी तुम मुझ-सी लगती हो।।
-राहुल कुमार गुप्त

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