अवधी होली राग
महुवा अमुआ कै मंजारिया,
उनहुँ के जिया महकावत होइहैं ।
बैरी कोयलिया वहू बगिया,
कछु मादक राग सुनावत होइहैं ।।
फागुन की यह मस्त हवा
कछु याद हमारों भी दिलावत होइहैं ।
हे सखी ! लागत है हमका
हमरों पाहुन घर आवत होइहैं ।
- अरविन्द कुमार साहू
मनवे फगुवास गईल
अब त इ मनवे फगुवास गईल।
अपना लोगन से मिले खातीर पियास गईल।।
अपना लोगन के बीच में रहे के मन करे ला।
मन में आपन लोग ही त रंग भरे ला।।
लाल पियर रंगवा गलवा में लगाइके।
चलल जाई रोडवा पर बालवा फहराइके।।
जेकरा में ना लागल रहे रंगवा, उ खिड़की झांके।
लगते रंग पहिले गरियावे, फिर मिल जा ला टोली में आके।।
अब त भउजी वाला नाली क पानी इतिहास भईल।
अब त इ मनवे फगुवास गईल ।
अपना लोगन से मिले खातीर पियास गईल।।
– उपेंद्र राय







