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    Home»धर्म»Spirituality»Short Inspirational

    कहानी: वासवदत्ता

    By January 25, 2020 Short Inspirational No Comments13 Mins Read
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    महान सम्राट अशोक के काल में हुई थी, वासवदत्ता। वह मथुरा की राजनर्तकी थी। उन दिनों मथुरा शुरसेन प्रदेश कहलाता था और उज्जैन राज्य के अधीन एक महाजनपद कहलाता था। उज्जैन का शासक चंड प्रद्योत वासवदत्ता से भली भाति परिचित था। उसी ने वासवदत्ता के रूप, यौवन, कला निपुणता, विशेषकर उसे नृत्यगान की प्रवीण पर मुग्ध होकर उसे राज नर्तकी का पद दिया था। शासन की ओर से उसे उंची अटटलिका वाला भवन, दास-दासियां और प्रचुर धन- संपदा देकर उसका मान बढ़ाया था। शासक वर्ग का आमोद- प्रमोद बनााना उसका मुख्य कार्य था। उदीयमान कला-प्रिय कुमारि कन्याओं को कला प्रवीण बनाना और उन्हें सामंती राज्य व्ययस्था में ‘विलासिनी नारी’ बनाना ही उसका वययसाय था। भोग और विलासिता उसका जीवन था और अन्य स्त्रियों को भी यही सिखाना उसका व्ययसाय!

    रूप के मद् में मदहोश और धन पद के गर्व से गर्वित वासवदत्ता मथुरा की एक ऊंची अटट्लिका के भवन में रहती थी। राजा जिसका प्रेमी हो, वह भला रूप गर्विता क्यों न होती? वासवदत्ता के लिए यही जीवन था। यही जीवन का सत्य भी था।

    एक दिन वह अपनी अट्टालिका के भवन में दासियों से अपना केस सिंगार करा रही थी कि महल के गवाक्ष से उसने एक मुंडित केस युवा भिक्षु ने शिष्यों के साथ राज मार्ग से जाते देखा। भिक्षु को देख वासवदत्ता को कुछ कौतुहल हुआ। विनोद भी सूझा। उसने अपनी सखी – दासी से कहा- ‘देखो तो उस भिक्षु को! ठस युवा अवस्था में उस सुन्दर पुरूष को भिक्षु बनने की क्या सूझी! लगता है उसने कभी यौवन का रस पिया नहीं या पीने को मिला नहीं। बेचारा…।’

    दासी ने अपने मुख पर अंगुली रख कर समझाया- शी…! देवि वासु! उस युवा भिक्षु के बारे में ऐसी टिप्पणी न करो! वह श्रीमंत महामहिम परम आर्चाय उपगु’ है। चक्रवर्ती सम्राट प्रियदर्शी अशोक के भी गुरु ! महाबोधि परमबुद्ध की शिष्य परंपरा से वह आए हैं। किसी पूर्व जन्म के पुण्य-प्रताप की ही फल है कि इस युवावस्था में वह संन्यासी हुए हैं और सम्राट ने उन्हें अपने गुरु रूप में आदर दिया है।’ रूप गर्वित वासदत्ता विनोद की मनस्थिति में थी। उसने दासी से हंस कर कहा- ‘वह कोई भी हो, किन्तु वासवदत्ता के भ्रूकटाक्षों के वाणों का आघात वह सह नहीं पाएंगे। यदि तुम शर्त लगाओ तो मैं चमत्कार कर सकती हूं। मैं यदि उनसे प्रणय निवेदन कर दूं, तो यह महाशय अभी दंड- कमंडल त्याग कर वासवदत्ता के इसी महल में अपना पूरा जीवन चाकर बनकर व्यय्तीत करने को तत्पर हो जाएंगे।’

    दासी ने दोनों हाथ कानों से लगाकर कहा-‘ऐसा अशुभ न कहो देवि! उस देवज्ञ संन्यासी के बारे ऐसा सोचना पाप है। वह जीवन के भोगो से ऊपर उठ चुके महात्मा हैं। आपका विचार केवल अनुचित है,बल्कि असंभव भी है।’ गर्व-दर्प से चूर वासवदत्ता को दासी की बात चुभ गई। वह तत्काल उठी। महल के द्बार की ओर दौड़ी। चलते-चलते कहती गई ‘ तुम मूर्ख हो दासी! मूर्ख हो, इसिलिए तो दासी हो। मैं इस सुन्दर युवा संन्यासी को प्रेम करना सिखाऊंगी। बताऊंगी कि उसका मार्ग मिथ्या है। जीवन का मर्म संन्यास में नहीं,भोग और प्रेम है। तुम देखना दासी, विजय किसकी होगी।’

    दासी को अवाक छोड़ वासवदत्ता महल के द्बार के पर जा पहुंची। वहां से रापथ पर। दासियां वासवदत्ता के पीछे दौड़ी। वासवदत्ता के केश खुले हुए थे । सद्य: स्नाता थी वह! चेहरे पर अपूर्व लावण्य और यौवन की मदिरा संभाले न संभलती थी। महात्मा उपगुप्त के पीछे से पहुंचकर वह उनके ठीक सामने आ खड़ी हुई। कुछ हांफते हुए बोली-‘क्षमा करें आचार्य! एक क्षण रुकें। मैं राजनर्तकी वासवदत्ता आपको प्रणाम करती हूं। आपसे कुछ निवेदन करना है।’

    उपगुप्त और उनका पूरा शिष्य परिवार रुक गया। इस शिष्य परिवार में भी अनेक ऐसे थे, जिन्होंने वासवदत्ता का नाम सुना था। अनेक ऐसे थे, जिन्होंने संन्यास आश्रम से पूर्व मन ही मन वासवदत्ता की कामना की थी। यौवन और सौन्दर्य की अधिष्ठात्री को सामने हठात खड़ी देखकर बहुत से शिष्य भी सुध-बुघ भूल गए। उपगुप्त ने नख से शिख तक वासवदत्ता को देखा, फिर अधरों पर मुस्कान लाकर करुणापूर्वक बोले- ‘बोलो देवि!’

    वासवदत्ता ने बिना किसी कटाक्ष के सौम्यता से कहा-‘मैं महाजनपद मथुरा की वासवदत्ता हूं महात्मन्! निकट ही मेरा आवास है मैं चाहती हूं कि आप थोड़ी देर के लिए मेरे आवास में पधारकर मेरी कुटिया को पवित्र करें। थोड़ा आहार लें, तनिक विश्राम करें। मुझे भी कुछ उपदेश दें अन्यथा…।’

    ‘ अन्यथा…?’ उपगुप्त ने पूंछा।

    ‘ अन्यथा मैं समझूंगी कि राजनर्तकी और स्त्री होने के कारण आप मुझे तिरस्कृत और पतिता समझते हैं।’ वासवदत्ता ने थोड़ा कटाक्षपूर्ण कहा। उपगुप्त वासवदत्ता के कटाक्ष का मर्म समझ गए। उन्होंने कहा-‘स्त्री और पतिता को भी संघ में प्रवेश का अधिकार होता है। यद्यपि मैं आपको पतिता नहीं मानता। कुछ आगे मेरा पड़ाव है, यदि तुम्हारी कुछ जिज्ञासा है, तो उसका समाधान मैं पड़ाव स्थल पर करने का प्रयास करूंगा। जहां तक तुम्हारे आवास में मेरे जाने, आहार लेने या विश्राम करने का प्रश्न है, अभी वह समय नहीं आया है। ’

    ‘ अभी वह समय नहीं आया है?’ वासवदत्ता चौंकी-‘ क्या वह समय तब आएगा, जब मैं वृद्धा हो जाऊंगी? तब आपने युवावस्था में संन्यास मार्ग क्यों चुना, महात्मन?’

    ‘ युवावस्था से संन्यास का कोई संबंध नहीं है। तुम्हे यह भ्रम कि तुम युवा हो या मैं युवा हूं। जिस दिन भ्रम और अहंकार मिटेगा, मैं तुमसे अवश्य मिलूंगा।’ उपगुप्त ने कहा और शिष्यों को आगे चलने का संकेत देकर स्वयं आगे बढ़ लिए। वासवदत्ता आवाक् ! वह तिलमिलाकर रह गई। उसकी आयु अभी बत्तीस वर्ष की थी। छब्सीस वर्ष की आयु में वह राजनर्तकी राजनर्तकी बनी थी। विगत् 6 वर्षों में यह पहला अवसर आया था, जब किसी पुरुष को उसने अपनी ओर से आमंत्रण दिया था और उसने वासवदत्ता के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था। हताश और उद्धिग्न हो वासवदत्ता महल में लौटी। दासी से उसने बात न की। अपने कक्ष के जड़ाऊ पलंग पर वह औंधे मुंह लेटी रही। फफक। फफक कर रोती रही। इतना अपमान? वह भी एक भिक्षुक द्बारा। जिसकी एक झलक पाने को बड़े-बड़े श्रेष्टिपुत्रों और सांमतों में होड़ लगती हो। स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैलियां लुटाई जाती हों। उसका इतान अपमान। व्यर्थ है यह यौवन और यश! कितना निरर्थक है यह रुप और उसकी मायावी नृत्यकला। तभी दासी ने आकर तनिक सकुचाते हुए कहा-‘क्षमा करें देवि! श्रीमंत महाराज चंड प्रद्योत स्यं पधारे हैं। आपको स्मरण किया है। अभी। उनका कथन है कि कुछ सैन्य अधिकारी उनके साथ हैं। आपको नृत्यगान के तैयार होने को कहा है। कुछ समय यहां बिताकर प्रस्थान करेंगे।

    उद्बिग्नता के आवेश में वासवदत्ता ने क्रोध में कह दिया- ‘श्रीमंत महाराज श्री से मेरी ओर से निवेदन पूर्वक कह दो कि वासवदत्ता का स्वास्थ्य ठीक नहीं। आज वह उनका और उनके साथियों का मनो-विनोद करने में असमर्थ है। मैं उनसे मिलना भी नहीं चाहती।’

    दासी चौंककर बोली-‘ यह क्या कह रही हैं देवी! श्रीमंत महाराज से मैं ऐसा कैसे सकती हूं? उनके साथ उनके अतरंग मित्र भी हैं।’

    इस महल में वासवदत्ता के अलावा अन्य नर्तकियां भी तो हैं। सुजाता, मेनका, उर्वशी। अन्य कोई भी…।

    ‘कि न्तु देवी…’

    ‘किन्तु-परन्तु कुछ नहीं। मैं नहीं नाचूंगी।’

    दासी चुपचाप चली गई। उसने महाराज श्री से जाने कैसे क्या कहा कि थोड़ी देर में ही महाराज श्री स्वयं उसके कक्ष में आ पधारे। वासवदत्ता से उन्होंने सप्रेम कारण पूछा। अनुनय विनय की। अपने प्रणय का वास्ता भी दिया, किंतु वासवदत्ता न मानी। हठपूर्वक उसने यहां तक कह दिया-‘ जब तक वह हठी संन्यासी उपगु’ उनके महल में नृत्यगान देखेंगे।सुनेंगे नहीं, वह नहीं नाचेगी। नृत्यगान बंद।’

    महाराज श्री वासवदत्ता की बात को ‘स्त्री-हठ’ मानकर हंसते हुए चले गए। जाते- जाते वह एक गम्भीर बात कह गए- ‘ उपगुप्त एक स्थितप्रज्ञ प्रबुद्ध संन्यासी हैं। वह चक्रवर्ती सम्राट प्रियदर्शी अशोक के गुरु हैं। वह इन दिनों भारत भर में शिलालेखों और बौद्ध विहारों के निर्माण और उन पर जनकल्याण के उपदेश उत्कीर्ण कराने में व्यस्त हैं। इस जन्म में तो उनका वासवदत्ता के महल में आना असंभव है।’

    वासवदत्ता ने सुना। महाराज श्री तो चले गए, किंतु वासवदत्ता ने प्रण कर लिया कि अब वह नहीं नाचेगी। तब तक कि उपगुप्त स्वयं उसके महल में न पधारें।

    समय धीरे-धीरे गुजरने लगा। वासवदत्ता अपने निर्णय पर अटल । नृत्यगान बंद। धीरे-धीरे पहले मथुरा जनपद, पुन: उज्जैन और अंतत: संपूर्ण प्रदेश भर में,जहां-जहां तक वासवदत्ता की यशकीर्ति थी, यह बात फैल गयी। पहले श्रेष्ठि-पुत्रों और सामंतों में, फिर जन सामान्य में चर्चा होने लगी। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। एक राजनर्तकी और एक वीतराग संन्यासी के अद्बितीय द्बंद ने लोगों में कौतुहल कर दिया।

    कुछ माह बाद एक दिन श्रीमंत महाराज वासवदत्ता के महल में पुन: पधारे। वासवदत्ता को समझाने का प्रयास किया। अपने प्रणय का पुन: वास्ता दिया, तो वासवदत्ता ने गंभीरता से, किंतु शुष्क स्वर में कहा-‘पद, धन, यश, प्रतिष्ठा, महल, दास-दासियां देकर आपने मुझे प्रयसी माना है। आपको मेरी देह से प्रेम है, तो वह आपको समर्पित है, किंतु, यदि मुझसे, मेरी आत्मा से प्रेम हे, तो मेरी प्रसन्नता के लिए कोई ऐसा उपाय करो, जिससे वह हठी संन्यासी महल तक आए। मैं उनका हृदय सत्कार करूंगी, अन्यथा आपके प्रेम का यह ‘दिखवा’ मुझे अस्वीकार है।’

    महाराज वासवदत्ता के इस अव्यावहारिक तर्क का क्या उत्तर देते। सौंदर्य गुणवान वासवदत्ता को वह खोना भी नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने वासवदत्ता राजनर्तकी पद से च्युत तो नहीं किया, किंतु खिन्न मन से वापस चले गए। यह सोचकर कि कभी तो इस हठी स्त्री का दर्प टूटेगा।

    समय बीतने लगा। दिन महीनों में और महीने वर्षों में बीतने लगे। वासवदत्ता कृशकाय हो गई। उसका दर्प अभी भी न टूटा था। नृत्यगान बंद था। मील में रहते-रहते ऊब गई- एक दिन उसी दासी ने वासवदत्ता से कहा-‘ हे देवि! सुना है, मथुरा के एक शिल्पी ने अपनी मूर्तिकला की प्रदशर्नी आयोजित की है- मथुरा का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार और मूर्तिशिल्पी है वह! सैकड़ो स्त्री-पुरुष, श्रेष्ठ, सामंत, नायक, सेनानायक प्रदशर्नी देखकर आए हैं7 लोग उसकी कला की प्रशंसा करते अघाते नहीं। कहते हैं, उसकी कुछ मूर्तियां इतनी जीवंत हैं कि अभी बोल पड़ेंगी। देवि, यदि चाहे तो वह प्रदशर्नी देखने चलें। बहुत दिनों से इस महल से बाहर निकली भी नहीं हैं। थोड़ा मनोविनोद भी हो जाएगा।’

    अपने हठ से संत्रस्त और महल में निरर्थक जीते- जीते ऊब चुकी वासवदत्ता ने हामी भर ली।

    पालकी मंगवाई गई। सांयकाल वासवदत्ता ने अपना संपूर्ण सिंगार किया। उसका मुर्झाया सौंदर्य सिंगार से दोबारा खिल गया। पूर्ण राजशी ठाठ-बाठ से पुन: राजनर्तकी वासवदत्ता ‘बनकर पलकी में बैठ मूर्ति प्रर्दशनी देखने जा पहुंची।

    प्रर्दशनी स्थल पर खासी भीड़ थी। उच्चवर्ग के स्त्री-पुरुषों से प्रर्दशनी स्थल भरा पड़ा था। जैसे ही लोगों को मालूम पड़ा कि राजनर्तकी वासवदत्ता, जिसने वर्षोे से नृत्यगान बंद कर रखा है।

    मूर्तिप्रदर्शनी देखने आयी है। लोग प्रदर्शनी छोड़ वासवदत्ता को देखने लगे। आखिर सौंदर्य की साक्षात् प्रतिमा ही जो सामने थी। प्रदर्शनी का मुख्य शिल्पी, जिसका नाम चित्रसेन था, उसे भी जब मालूम पड़ा कि देवी वासवदत्ता स्वयं पधारी हैं, तो वह सभी सामंतो श्रेष्ठ-पुत्रों को छोड़ वासवदत्ता का स्वागत् करने आया। वासवदत्ता को प्रणाम कर उसने कहा -‘ देवी! आप पधारी, मेरी साधना सफल हुई, मेरा जीवन सफल हुआ। आइए पधारे, मैं आपको एक-एक मूर्ति दिखाऊं। के बारे बताऊंगा भी।’

    वासवदत्ता का मन मूर्तियों में रमा। अत्यंत उत्कृष्ट कला थी उनमें। चलते-चलते उसने चित्रसेन से पूंछा-‘ चित्रसेन मेरे आने पर तुम्हारी साधना सफल हुई, यह बात तो समझ आई। मेरे यश और पद को सम्मान देने के लि संभवता तुमने ऐसा कहा, किंतु ‘ जीवन सफल हुआ’ वाली बात समझ में नहीं आयी।’

    चित्रसेन की आंखों में चमक आ गई। थोड़ा धीमे स्वर में बोला-‘ देवी, थोड़ा एकान्त में, जहां वह बड़ी मूर्ति कोने में लगी है, वहां चले, तो आपको आपके प्रश्न का उत्तर दूंगा।’

    वासवदत्ता उधर चल दी। वासवदत्ता को निकट से देखने वाली भीड़ भी इसीलिए पीछे हट गयी। कोने में उस मूर्ति को दिखाते हुए चित्रसेन ने वासवदत्ता से कहा-‘ देवी! इस प्रतिमा को देखो।’

    वासवदत्ता ने जैसे ही उस प्रतिमा को देखा, उसके मुंह से निकल पड़ा-‘ अरे! यह तो मेरी ही प्रतिमा है। मेरा ही प्रतिबिम्ब! चित्रसेन।

    चित्रसेन मुस्कुराकर रह गया। बोलो-‘देवी! यह स्वपन नहीं। यर्थाथ है। मैं भी कोई इन्द्रजलिका नहीं। मात्र शिल्पी हूं। संभवता आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा।’

    वासवदत्ता जाने क्या समझी। बोली-‘ चित्रसेन! बताओ, क्या मूल्य है इस प्रतिमा का! जो चाहो मांगो। राजनर्तकी वासवदत्ता के पास स्वर्ण का भंडार है। बोलो चित्रसेन। कितना स्वर्ण चाहिए तुम्हें?’

    चित्रसेन की आखें छलछला आई। कहा-‘देवी! आप स्वयं महान शिल्पी हैं। कलाकार। इसलिए राजनर्तकी भी हैं। कला कोई मोल नहीं होता, यदि वह मन को भा जाए। रूप और पद ने आपको भी राजाओं और सामंतो की तरह कला का मूल्य लगाने की प्रवृति दे दी है, देवी! मैं एक कलाकार को अपनी प्रति नहीं बेच सकता।

    सहसा वह वासवदत्ता गम्भीर हो गयी। कुछ रुक कर बोली-‘तो फिर तुम्हारा जीवन कैसे सफल होगा, चित्रसेन। मेरे प्रश्न का उत्तर…?’

    चित्रसेन ने भर्राय स्वर में कहा-‘आप चाहे तो मेरा जीवन सफल हो सकता है। आप चाहे तो इस प्रतिमा का, इस शिल्प का मूल्य चुका सकती हैं। बस, आप दोबारा नृत्यगान प्रारंभ कर दें। आपका नृत्य ही इस प्रतिमा मूल्य है और मेरे जीवन की सफलता भी।’

    वासवदत्ता आवाक रह गई। रुंधे कंठ से बोली- ‘चित्रसेन! यह तुम क्या मूल्य मांग रहे हो? मेरा दर्प, मेरा स्वत्व?

    चित्रसेन ने अपनी दृष्टि करके कहा-‘ देवी! मैं आपसे अपना प्रेम मांग रहा हूं जिसे प्रदर्शित करने का मेरे जैसे तुच्छ व्यक्ति के पास इसके अतिरिक्त और कोई उपाय न था। मैं आपको तबसे प्रेम करता हूं, जब आप राजनर्तकी न थी। मेरी दस वर्षों की साधना है यह प्रतिमा।’

    वासवदत्ता की रुंधे झलक आई। ‘प्रेम’ का सही अर्थ पहली बार उसके सामने प्रकट हुआ।

    वासवदत्ता की प्रेमकथा यहीं समाप्त नहीं हुई। प्रेम की सुगंध पाकर उसने राजनर्तकी का पद त्याग कर चित्रसेन से विधिवत विवाह कर लिया। इसके बाद वह पुन: नृत्यगान में रत हो गयी। चित्रसेन से विवाह के पश्चात् वह ‘मां’ बनी अथवा नहीं, यह तो पता नहीं, किंतु वह नृत्यगान में संपृक्त रही। कुछ दिनों बाद चित्रसेन की मृत्यु हो गई। चित्रसेन की मृत्यु के वासवदत्ता का यौवन ढल गया। कुछ दिनों बाद एक ऐसी व्याधि ने आ घेरा। जिससे उसकी देह गलने लगी। उसकी जिस देह पर लाखों लोग दृष्टिपात करते ही स्वर्ण मुद्राएं लुटाने लगते थे, वह स्वेत कुष्ठ से जराजीर्ण हो गई। लोगों ने उसे पहले नगर, गांव और अन्त में जगलों से निकाल दिया। बच्चे उस पर पत्थर फेकने लगे।

    ऐसी ही बेहाल अवस्था में जब वह एक वृक्ष के नीचे पड़ी कराह रही थी, अपने शिष्यों के साथ उपगुप्त उधर से गुजरे। उपगुप्त उसे अपने संग में ले गये उसकी सेवा-सुश्र्षा करके उसे ‘ठीक’किया। अंत में, जब उपगुप्त ने वासवदत्ता को और वासवदत्ता ने उपगुप्त ने पहचाना तो दोनों की आंखों में अश्रु थे। वासवदत्ता उपगुप्त की शिष्या बनी। दीक्षा देते समय उपगुप्त ने उसे प्रथम और अंतिम उपदेश दिया-‘जीवन क्षण भंगुर है। यह देह भी, नश्वर है। प्रेम ही सर्वोच्च है। प्रेम- जिसमें कुछ ‘पाने’ की कामना न हो। जो इस ‘प्रेम’ को उपलब्धि कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है।’ शायद यही वह है, जिसे ‘योक्षेम वहाम्यह्म’ कहा गया है।

    • साभार:बृज गोपाल राय

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