केकड़ों तुम्हारी इतनी हिम्मत?

0
911
Spread the love

केकड़ों के लिए यह गौरव का क्षण है। उनकी हैसियत को पहली बार पहचाना गया। दीमक की हैसियत को तो फिर भी पहचाना जाता था कि वह सब कुछ खोखला कर देती है। पर केकड़ों की इस अहमियत को कोई नहीं समझता था कि वे चाहें तो विशाल बांध को खोखला कर दें। चूहों ने तो फिर भी फसलों को नष्ट करने में अपनी भूमिका को स्वीकार करवा लिया था। खाद्यान्न भंडारों में अपनी स्थायी हिस्सेदारी स्थापित कर ली थी, पर केकड़ों को कोई पूछ ही नहीं रहा था।

समुद्र किनारों पर केकड़ों ने अपने नायाब स्वाद से तो अपनी एक हैसियत जरूर बनाई पर उन्हें विनाशक किसी ने न माना था। उन्हें याद किया जा रहा था तो इसी रूप में कि किसी टोकरी में बहुत से केकड़े रख दिए जाएं तो वे अपने सामूहिक प्रयास से किसी को भी टोकरी से बाहर नहीं निकलने देते। उसकी हैसियत बस टांग खींचने वाले की रह गई थी। हालांकि टांग खींचने वाले राजनीति में उनसे कहीं ज्यादा पाए जाते हैं। लेकिन अब उनकी हैसियत को पहचाना लिया गया है। यह पहचान भी उन्हें एक हादसे की वजह से मिली है।

महाराष्ट्र में तिवारा का बांध टूट गया। हालांकि आजकल बांध कम टूटते हैं। बांध टूटने के उदाहरण कम मिलते हैं पर इंसानों के दुर्भाग्य और केकड़ों के सौभाग्य से तिवारा बांध टूट गया। इससे पहले सरकारों और ठेकेदारों पर कोई इल्जाम लगता, महाराष्ट्र के एक मंत्री ने केकड़ों पर इसका इल्जाम मढ़ दिया। खाद्यान्न भंडारों में अनाज कम पड़ जाए तो उसका दोष चूहों पर मढ़ा जा सकता है, और इससे चूहों की एक हैसियत बनी रहती है। हालांकि अभी तक चीनी की चोरी का इल्जाम चींटियों पर नहीं लगा है।

धार्मिक लोग उन्हें आटा वगैरह वैसे ही खूब खिलाते रहते हैं। किसानों की फसलों को नष्ट करने का इल्जाम भी नील गायों और बंदरों पर नहीं लगता। मंडियों में आढ़तियों की दुकानों पर पड़ी फसल को चरने वाली गायों पर भी आरोप नहीं लगता। फसलों को नष्ट करने का आरोप कीटों पर भी नहीं लगता, टिड्डी दल तो आजकल वैसे भी नहीं होते। पर बांध टूटने का आरोप केकड़ों पर लग गया। यह कोई सब्र का बांध नहीं था। इसके दो फायदे हुए-एक तो सरकार जवाबदेही से बच गई, ठेकेदार भ्रष्टाचार के आरोप से बच गए और केकड़ों की एक हैसियत बन गई। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here