हम आयेंगे फिर से दो वक्त की रोटी के लिये

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हम आयेंगे फिर से इन जगमगाते शहरों में..
कि इनकी रोशनी जो बरकरार रखना है
अपने खून-पसीने से इन्हें आबाद रखना है

अभी गाँवों की यादों का मौसम ताजा हो चला है..
कि इन शहरों में न अब कोई अपना सा दिख रहा है
अजनबी हैं अब अपने ही देश में, जैसे सब कुछ छिन रहा है

फिर भी हम शहरों के आभारी हैं, हम आयेंगे जरूर
हम आयेंगे फिर से दो वक्त की रोटी के लिये
हम आयेंगे फिर से मशीनों की तरह जीने के लिये

अभी अपने पांवों से नापनी है एक कठिन ज़िंदगी
पहुँचना है अपनों के पास रोटी और पानी के लिये
खुद की पहचान, खुद के टूटे-फूटे सम्मान के लिये

भूखे-प्यासे, पसीना निकालते, पुलिस की लाठियाँ व गालियाँ खाते
अभी तो चल रहे हैं सड़कों पर, रेल की पटरियों को नाप रहे हैं
अपने बच्चों व परिवार के खातिर बस हम चल रहे हैं, चल रहे हैं

हम आयेंगे फिर से इन जगमगाते शहरों में..
कि इनकी रोशनी जो बरकरार रखना है
अपने खून-पसीने से इन्हें आबाद रखना है

हम आयेंगे फिर से यहाँ ठेले पर सस्ता व ताजा खाना लगाने
हम आयेंगे फिर से यहाँ जूतों पर पालिश करने, रिक्शा चलाने
हम आयेंगे फिर से यहाँ के कारखानों पर अपना श्रम लगाने

हम आयेंगे.. हम आयेंगे.. फिर से इन शहरों को बनाने अपना
आज ये अपने नहीं हुए, कल शायद ये समझने लगे हमें अपना
हम आयेंगे इस विश्वास के साथ, न खोने पाये अब सम्मान अपना

हमारी मजबूरी पे हम हँसते देख रहे हैं देश के ‘चील-कौओं’ को
संसद न गंभीर हुई? मृत्यु से भारी इन तीखे-तीखे ज़ख्मों पर
हर ज़ख्म सहे हैं शहरों में, हर ज़ख्म सह रहे सड़कों पर

फिर भी हम मौन हैं, क्योंकि हम मजदूर हैं, हम मजबूर हैं
हम भाग लेंगे, हर बार की तरह लोकतंत्र के महापर्व पर
इस आशा से कि शायद अब इनायत हो हम मजबूरों पर

हर बार की तरह ही ठगे जायेंगे हम और हमारे सपने
काश् गरीबी एक जाति होती, गरीबी एक धर्म होता !
तो हमारा भी सियासत के गलियारों में सम्मान होता

  • राहुल कुमार गुप्त

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