चुड़ैलें बहुत हँसती हैं,
बेशर्म और ज़िद्दी होती हैं,
बेहद बातूनी होती हैं और हर बात पर
बहस करती हैं अनथक ।
चुड़ैलें अपनी ज़िन्दगी के हर फ़ैसले ख़ुद लेती हैं
और इसलिए बेहद डरावनी होती हैं ।
लोगों को विश्वास होता है कि वे सारी औरतों को
बिगाड़ सकती हैं और इस दुनिया को
नरक बना सकती हैं ।
चुड़ैलें समझौते नहीं करतीं
बुद्धिजीवियों की तरह,
न ही हर क़ीमत पर शान्ति खरीदने की कोशिश करती हैं
अतिशय शान्तिप्रेमी सद्गृहस्थों की तरह,
न ज़माने के हिसाब से चलने या ढलने की
कोई कोशिश करती हैं ।
चुड़ैलें प्रतिवाद करती हैं, सवाल उठाती हैं,
असहमति प्रगट करती हैं और पलटवार करती हैं ।
चुड़ैलें दिन के उजाले में दुनिया की तमाम
औरतों में घुली-मिली रहती हैं
पर अक्सर अपनी आदत से पहचान ली जाती हैं ।
कई बार कोई पुरुष अचानक पाता है
कि उसकी पत्नी या बेटी एक चुड़ैल बन चुकी है ।
फिर दुनिया के तमाम ओझा-गुनी और तांत्रिक उन्हें
तरह-तरह से बाँधते हैं, समझाते हैं और
विफल होकर फिर तरह-तरह से दण्डित करते हैं ।
अक्सर उन्हें दूर देश निर्वासित कर दिया जाता है
लेकिन वे हमेशा लौट आती हैं और बिना रुके
फिर अपने काम में लग जाती हैं ।
वे उद्विग्न-अशान्त आत्माएँ होती हैं
सृष्टि के ओर-छोर तक भटकती हुई ।
वे शापित यक्ष-कन्याएँ होती हैं
जिनके क्षमा-याचना करने या देवलोक जाने के पारपत्र के लिए
प्रार्थना-पत्र लिखने का कोई इतिहास नहीं मिलता ।
चुड़ैलों के दुःखों के आख्यान विरल ही मिलते हैं
अमावस्या की रात श्मशान के नीरव एकान्त में
चुड़ैलें किसी ऐतिहासिक पीड़ा को लेकर
ख़ून के आँसू रोती हैं
और कवियों के लिए मिथकीय रहस्यों का
सृजन करती हैं ।
चुड़ैलें तिरस्कृत चमगादड़ों से संवाद करती हैं
और रात को भनभन करते हुए
उनके साथ आकाश में गोते लगाती हुई उड़ती हैं ।
वे छम-छम पायल बजाते हुए
अपने उल्टे पैरों से नाचते हुए
चौंरे के पोखर तक नहाने जाती हैं
और फिर पास के बूढ़े पीपल के पेड़ पर चढ़ कर
उसकी सबसे ऊँची डाल से
तमाम स्त्रियों की उचाट नींदों और प्रतिबंधित सपनों में
झम्म से कूद पड़ती हैं ।
– कविता कृष्णपल्लवी







