बबुआ तनी धीरे चल, जमाना बहुत खराब बा

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बबुआ तनी धीरे चल,
जमाना बहुत खराब बा।
चलहूं के जेकरा नईखे सहुर
ओहू क करोड़ों क ख्वाब बा।
हर मौज मस्ती चाही ईहा,
ईज्जत क ना कवनों ख्याल बा।

बबुआ तनी धीरे चल,
जमाना बहुत खराब बा।
घरवा चिट्ठी लिखे क भाव त
सब पहिले ही भूला गईल।
भाव क त बातें छोड़,
आज प्रणाम क प्रकिया भी
देश से गईल।
अब न “सादर” बा, न उ आदर बा।
उघरल बा पैर सबकर,
ना त कहीं ओढे़ खातिर चादर बा।।
अब पड़ोसी वाला चाचा क त बाते छोड़,
अब लइकवा पिता जी के भी कहत फादर बा।
थइली में भले ना बा एको रुपइया,
लेकिन सबकर आपन-आपन रूआब बा।
खाना बने के ना बा ठेकान,
लेकिन हर घर में रखल शराब बा।
बबुआ तनी धीरे चल
जमाना बहुत खराब बा।

  • उपेंद्र नाथ राय

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