ऐ जिन्दगी, मैं तुझसे निराश नहीं

0
487

ऐ जिन्दगी, मैं तुझसे निराश नहीं।
तू ठहर जाएगी, इसकी भी कोई आस नहीं।।
ऐ जिन्दगी, मैं तुझसे निराश नहीं।।
मैं अपनों की गोद में सोया रहूं,
तब मौत बनकर तू आ जाना।
वहां भी नहीं रहेगा तुझसे कोई सिकवा,
यहां नहीं पड़ेगा अपनों से ठोकर खाना।।
मैं उब चुका हूँ तुझसे,
जगत का सह सकता परिहास नहीं।
ऐ जिंदगी, मैं तुझसे निराश नहीं।
तू ठहर जाएगी, इसकी भी कोई आस नहीं।।

  • उपेंद्र नाथ राय 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here