जी के चक्रवर्ती
देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से एक मात्र राज्य पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस एवं उसके प्रधान नेतृत्त्व ममता बनर्जी ने सम्पूर्ण देश में राजनीतिक क्षेत्र में हलचल मचा कर रख दिया है। वैसे तो मौजूदा समय मे देश के इन पांच राज्यों में हुए चुनावों में से केवल चर्चा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और ममता बनर्जी की जीत और भाजपा के नरेंद्र मोदी की हार की चर्चा बड़ी जोर-शोर से हो रही है। बंगाल के चुनावीं परिणाम को देखने के बाद राजनीतिक विश्लेषक भी आश्चर्य में पड़ गये हैं। सही कहें तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को जिस तरह की जीत मिली है, उसकी कल्पना शायद स्वयं ममता बनर्जी ने भी नहीं किया होगा।

आख़िरकार ऐसा क्या हुआ कि तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में रेकॉर्ड वोटों से जीत कर राज्य में तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने जा रही है? क्या इसकी वजह ममता बनर्जी के चुनावीं सलाहकार प्रशांत किशोर के चुनावी रणनीति के कारण संभव हुआ? या ममता बनर्जी की इस राज्य के लोगों के मध्य अधिक लोकप्रियता के कारण यह संभव हुआ? वैसे सही कहा जाय तो ममता बनर्जी की इस शानदार जीत के पीछे बीजेपी ने भी महत्वपूर्ण योगदान जरूर दिया है, जरा आप सोच कर देखिये अकेले देश के इसी राज्य में सीबीआई, ईडी से लेकर बड़े-बड़े दिग्गज नेताओं ने चुनवीं प्रचार के दौरान इस राज्य में डेरा डाले रहना इस बात का धोतक है कि देश के इस राज्य को ज्यादा तबज्जो दिया है। जिसके कारण देशवासियों से लेकर इस प्रदेश के लोगों तक का ध्यान यहां के चुनवीं घटनाओं पर लगातार बने रहने के कारण यहां के जनता में तृणमूल कांग्रेस के प्रति सहानुभूति बनती चली गयी और इसका फायदा निश्चित रूप से इस चुनवीं दंगल में तृणमूल कांग्रेस को मिला।
ममता बनर्जी के इस जीत के साथ ही देश राजनीति हलकों में जिस दिन का बड़े लम्बे समय से सियासी गलियारों में इंतज़ार किया जा रहा था, वह समय आखिरकार आ ही गया। पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल ने राज्य पर अपनी हुकूमत को फिर से एक बार बनाये रखने में कामियाब हासिल कर यह सिद्ध कर दिया है कि बीजेपी की अनेको चेष्टाओं के बावजूद बंगाल की सत्ता की बागडोर आखिरकार उसके हाथ से निकल ही गया है।
अब मौजूदा समय मे एक बार पुनः विपक्षी पार्टियों के मध्य थर्ड फ्रंट बनाने वाली बातों की सुगबुगाहट होने लगी है। विपक्ष के प्रत्येक नेतृत्व ने ममता बनर्जी को उनके पार्टी की जीत की बधाई दी है, लेकिन ऐसा समझ लेना शायद जल्दबाजी कहलायेगी कि देश मे बीजेपी के विरुद्ध कोई बड़ा मोर्चा बनने की ओर अग्रसर हो रहा है। खैर यह समझने वाली बात है कि विधानसभा चुनावों के बाद विपक्ष को पुनः एक बार खड़ी करने जैसी बात की शुरुआत एक नये अंदाज में नाये सिरे से करनी होगी। क्योंकि बदलावों की आवश्यकता मौजूदा समय मे दोनों ही पक्षों की जरूरत है।







