अभी तो दिल्ली दूर है…?

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जी क़े चक्रवर्ती

कैराना लोकसभा उप चुनाव में भाजपा की हुयी हार से आगामी लोकसभा चुनाव में इस बात का इतना असर 2019 में होने वाले चुनाव में नहीं होने वाला है। क्योकि पहली बात तो यह कि इस चुनाव को होने में अभी लगभग एक साल का लंबा समय है। क्योकि यहाँ तो दो ही दिनों में स्थिति बिलकुल विपरीत दिशा में बदल जाती है। ऐसे में एक वर्ष के समय की कौन कह सकता है? अभी कैराना में भाजपा की हार से उत्तर प्रदेश के राजनितिक विपक्षियों को बहुत खुश होने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। क्योकि वहां की जीत की खुशी पर वे यह भी भूल जाएं की आगे की हमें कैसी रणनीति बनाना चाहिए या आगे भविष्य में अभी मिली इस जीत का फायदा कैसे उठाया जाये।

वैसे तो बार-बार यह कहना कि अभी तो दिल्ली दूर है बहुत उचित भी नहीं होगा क्योकि अभी इस पर निर्णय या पूर्व मत देने जैसी कोई स्पष्ट स्थिति भी नहीं है और अभी से ही कोई अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है कि देश में आगे आने वाले चुनावों में इसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है, बात को बढ़ाने से पहले हम अभी कैराना में आरजेडी एवं सहयोगियो को मिली जीत के परिणाम पर एक नजर डाले तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उप चुनाव में हार- जीत का अंतर भी इतना बड़ा भी नहीं है कि जिस पर बहुत खुश हुआ जा सके।

उत्तर प्रदेश के दस राज्यों की चार लोकसभा एवं दस विधानसभा सीटों के उप चुनाव के आये नतीजों ने भले ही मोदी सरकार को झटका दिया हो! पर इसे भाजपा की अगले चुनाव तक में स्थिति को स्प्ष्ट करने वाली बात विल्कुल भी नहीं कहा जा सकता है यहाँ हुई हार- जीत के फैसले को 2016 में उत्तर में हुई विधान सभा चुनाव में सपा की हुई हार तो दूसरी तरफ भाजपा को मिली जीत के अवलोकन में रख कर देखें तो एक बात स्प्ष्ट हो जाती है कि उत्तर प्रदेश की जनता को प्रदेश में उस वक्त सत्ता संभाल रहे सपा सरकार के कार्यों से उबने के बाद एक बदलाव लाने के पक्ष में वोट देकर भाजपा की सरकार को उत्तर प्रदेश की शासन- सत्ता को बाग़डोर उसके हाथों में सौप दिया। जबकि देश में होने वाले प्रत्येक चुनाव में अकसर यह देखने में आता है कि हारी हुई पार्टी दूसरी जीती हुई पार्टी पर, चुआव आयोग या ईवीएम मशीन पर अपने हार का ठीकरा फोड़ती है जबकी इसका मुख्य कारण जनता का आकोश है और सत्ता संभाल रहे दल के क्रियाकलापों से उसके मस्तिष्क में उसके प्रति बनने वाली छवि के कारण जनता बदलाव करने के पक्ष में जा खड़ी होती है।

वर्तमान में विपक्षी एकता को संगठित होने पर अधिक जोर दिया जा रहा है जबकि भारतीय जनता अब इतनी भोली भीं नही रह गई है कि उसको जिधर चाहो उधर हांक दो। जहाँ तक अब जनता की एक बड़ी संख्या इस बात को अच्छी तरह से समझ चुकी है कि चाहे गठबंधन की सरकार हो चाहे सारे विपक्षियों में से एक-एक आदमी मिलकर अलग से बनाई गई पार्टी हो अब वोह किसी के झांसे इतनी आसानी से नहीं आने वाली है।

अब देश की जनता इस मामले में बहुत परिपक्व दिखाई देने लगी है। अब वह समय भी बहुत दूर भी नहीं है जब भारतीय जनता को देश के किसी भी पार्टी या नेताओं से वादे नहीं चाहिए वल्कि उसे तो जमीनी आधार पर उनके लिये किसी भी पार्टी के नेता द्वारा किये गये कामो का हिसाब और उसका परिणाम चाहिए।

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