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    विवादों में कैंब्रिज एनालिटिका: यानि सत्ता की मास्टर कुंजी!

    By March 30, 2018 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    अनुराग चौधरी

    यह जो पूरा मुद्दा है पहली बार असल में तब उठा जब अमेरिका में चुनाव 2016 में हुए और जनवरी 2017 में डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बन गए। जो चुनाव 2016 में हुए उसमे फेसबुक ने कैसे सहायता की डोनाल्ड ट्रम्प को जितवाने में, यहाँ से पूरा विवाद शुरू होता है।

    यह आरोप सिर्फ फेसबुक पर ही नही लगा उसके साथ साथ CAMBRIDGE ANALYTICA पर भी लगा। CAMBRIDGE ANALYTICA एक ब्रिटिश डाटा प्राइवेट कम्पनी है जिसके मालिक रोबर्ट मर्सर है। रोबर्ट मर्सर डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को फंड भी देते है।

    इस कम्पनी पर दो आरोप लगे पहला यह की जो 2016 में जो अमेरिका में चुनाव हुए उसमे मतदाताओं को प्रभावित किया गया दूसरा यह की जो BREXIT का REFERENDUM हुआ था जिसमे ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग होना चाहता था उस समय जब वोटिंग हुई तो उस समय भी ब्रिटेन के लोगों को यह कह कर प्रभावित किया की उन्हें अलग हो जाना चाहिए।

    क्रिस्टोफर वेली ने ही सारा खुलासा किया है। वेली पहले CAMBRIDGE ANALYTICA में ही काम करते थे इन्होने ने ही बताया है CAMBRIDGE ANALYTICA ने किस तरीके से 5 करोड़ अमेरिकीयों का फेसबुक डाटा लेकर उसको इस तरह से बनाया की लोगों का ब्रेनवाश किया जा सका और उनको डोनाल्ड ट्रम्प के प्रचार के ऐड दिखाए और कई तरह की चीजें की जिससे लोग डोनाल्ड ट्रम्प की तरफ आकर्षित हों और प्रचार में साथ दें। जिसके माध्यम से डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका में जहाँ भी जाये उन्हें पता हो की किस क्षेत्र में किस तरह के लोग हैं उसी प्रकार से रैलीयां कराई गयीं। तो ये सब चीजें CAMBRIDGE ANALYTICA के माध्यम से ही की गयीं हैं।

    असल में जब आप फेसबुक पर कोई एप USE करते है डाटा चोरी उसी समय शुरू होती है। जैसे आप कोई गेम खेल रहे हो या कोई भी फेसबुक के ऊपर कोई भी एप USE कर रहे हो जैसे कैंडीक्रेश वगैरा कई तरह के गेम होते है। जब भी किसी भी तरह के एप USE करते है तो आप को एक massage आता है जैसे *******WOULD LIKE ACCESS YOUR PUBLIC PROFILE AND FRIEND LIST तो ज्यादातर लोग OK कर देते हैं उसी समय आप का डाटा चोरी/लीक  होता है। जो ये एप होता है वो आपका नाम, पता, ईमेल, फ़ोन नंबर और भी डिटेल्स पता कर लेता है सिर्फ आप के एक OK से ही।

    वैसे फेसबुक अपनी फेसबुक प्राइवेसी पालिसी में कहता है की हम बहुत ही कम डिटेल्स SHARE करते है सिर्फ नाम, ईमेल तक ही SHARE करते हैं। लेकिन ऐसा आरोप फेसबुक पर लगाया जा रहा है की इस बार जानबूझकर CAMBRIDGE ANALYTICA को बहुत सारी चीजें ACCESS करवाई है। यह कहानी शुरू हो चुकी थी 2014 से ही  चुनाव तो 2016 में थे पर चुनाव की तैयारी दो साल पहले ही शुरू हो गयी थी।

    2014 में डॉ कोगान जो कैंब्रिज विश्वविद्यालय में साइकोलॉजी के प्रोफेसर है जिनको CAMBRIDGE ANALYTICA  दयारा 8 लाख डालर दिए गये जो एक ऐसा APPLICATION बनाएं जो फेसबुक USERS का डाटा निकाल  सकें।इस एप का नाम  thisisyourdigitallife था। जिसके बाद इस एप को लगभग 270000 लोगों ने  DOWNLOAD कर लिया  था जिनसे  इन लोगों का सारा निजी डाटा निकाल लिया गया।फिर डॉ कोगान ने सारा डाटा निकाल कर CAMBRIDGE ANALYTICA को बेंच दिया।

    डॉ कोगान की खुद की कम्पनी है जिसका नाम है GLOBAL SCIENCE RESEARCH इस कंपनी के द्वारा फेसबुक USER को कुछ पैसे ऑफर किया की आप इस सर्वे में भाग ले और निजी डाटा भरें जिससे डॉ कोगान ने उनका सारा निजी डाटा निकाल लिया ये भी डाटा इन्होंने CAMBRIDGE ANALYTICA को बेंच दिया। इस डाटा से CAMBRIDGE ANALYTICA ने इन सारे लोगों का PERSONALITY AND PSYCHOLOGICAL PROFILE बनाया की लोग क्या LIKE करते है, क्या COMMENT करते है, क्या SHARE करते है और आने वाले चुनाव में लोगों को क्या प्रिय और क्या अप्रिय है। क्या देख कर लोग चुनाव में वोट करेंगे ,किस तरह की बातें लोग कर रहें हैं इस तरीके से 5 करोड़ अमेरिकियों की साइकोलॉजिकल प्रोफाइल बनाई गयी। जब लोगों की एक बार साइकोलॉजिकल प्रोफाइल बन गयी तो उनको उसी तरह की ऐड दिखाए गये ये सारे ऐड डोनाल्ड ट्रम्प को सपोर्ट कर रहे थे जिससे डोनाल्ड ट्रम्प की जीत में काफी कारगर साबित हुए, जो भी ऐड थे सारे के सारे डोनाल्ड ट्रम्प के प्रति सहानुभूति रखते थे।

    फिर जब इसकी जाँच पड़ताल शुरू हुई रोबर्ट मूलर द्वारा इन्होंने बहुत बड़ी शरारत की। जब इन सब गिरोहों का पकड़ा जाना संभव होने लगा तो रोबर्ट मूलर ने यह कहा की तुम अपने डाटा को ऐसे दिखा दो की यह सारा काम रूस कि मदद से हो रहा था। रूस अमेरिका के चुनावों को प्रभावित कर रहा था। ये सब बाते अमेरिका के The Wall Street Journal  ने छापा था।

    जब इस मामले में फेसबुक आरोप लगा तो उसने कहा की हमने तो इस एप को 2015 में ही हटा दिया था क्यूंकि ये एप जरुरत से ज्यादा डाटा ले रहा थी जो फेसबुक पालिसी के खिलाफ थी। और दूसरी बात फेसबुक कह रहा है की लोग अपनी मर्जी से डाटा दियें है, कोई भी पासवर्ड हैक नही हुआ, ना ही कोई सेंसिटिव सूचना हैक हुई है हम इसमें दोषी नही है।

    अब फेसबुक के वकील कह रहे हैं की The Wall Street Journal और The Observer ये छूठे और बेबुनियाद खबरें/आरोप लगा रहे है। अब फेसबुक ने क्रिस्टोफर वेली और CAMBRIDGE ANALYTICA  को BAN भी कर दिया है।

    BLOOMBERG NEWS AGENCY  ने कहा है की भारत की राजनीतिक पार्टी भी CAMBRIDGE ANALYTICA के माध्यम से राजनीतिक प्रचार कर रही है। अब तो खबर आ रही है की 2019 के लोकसभा के आम चुनाव में भारत की राजनीतिक पार्टियाँ भी इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर करने जा रहीं है। गौरतलब है की पूरे विश्व में फेसबुक के सबसे ज्यादा यूजर भारत से ही हैं। हम सब के डाटा फेसबुक के पास हैं वह हम लोगों के मनोवृत्ति के अनुसार डाटा बना कर राजनीतिक पार्टियों को बेंच सकता है, मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं जिससे हमारा लोकतंत्र खतरे में है।

    सवाल अब यह उठ रहा है की आखिर भारत इसके खिलाफ कार्यवाही क्यूँ नही कर रहा है कोई भी PM ,CM ,कोई भी राजनेता इसके खिलाफ आवाज क्यूँ नही उठाई। सिर्फ यहाँ आरोप प्रत्यारोप का ही दौर चल रहा है। इसका कारण यह है की ये जो बड़ी बड़ी कंपनियां है FACEBOOK ,GOOGLE,TWITTER इत्यादि ये सारी कंपनियां भारत के बड़े बड़े राज्यों को प्रभावित करती हैं इनके साथ मिल कर ये बड़ी बड़ी इनिशिएटिव चलाती हैं जैसे फेसबुक ने उड़ीसा की सरकार के साथ मिल कर महिलाओं को उद्यमी बनाने की एक प्रोग्राम चला रहीं हैं, आंध्रप्रदेश के साथ मिल कर डिजिटल फाइबर प्रोजेक्ट चल रहा है, भारत सरकार की खुद डिजास्टर मैनेजमेंट विभाग फेसबुक के साथ मिल कर काम कर रही है। इस तरीके से सारी सरकारें फेसबुक, गूगल पर निर्भर होती जा रही हैं। जैसे गूगल भारतीय रेलवे को मुफ्त में wifi दे रहा है।मुफ्त में देकर जिससे हमारी सरकारों पर दबाव बनाये रखे और मनमाने तरीके से अपना बिजिनेस बढ़ा सके।

    हमें लगता है अगर अब भी हमारी सरकारों की आँखे नही खुलती हैं तो सत्ता की चाभी फेसबुक ,गूगल जैसे कम्पनी ही रखेंगे और ये कंपनियां तय करेंगी किस देश में कौन राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री बनेगा। फिर  से हम गुलामी की जंजीरों में बंध जायेंगे और हम लोकतंत्र और संविधान की दुहाई ही देते रह जायेंगे।

    लेखक डा. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय ,लखनऊ के विधि छात्र हैं

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