पूनम नेगी
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के ग्रामीण क्षेत्र में आदमखोर कुत्ते अब तक तकरीबन डेढ़ दर्जन बच्चों की जान ले चुके हैं। जिला प्रशासन ने गांव में बच्चों के घर तक से बाहर निकलने पर रोक लगवा दी है। मामले की गंभीरता का आलम यह है कि खुद मुख्यमंत्री को हादसों वाले क्षेत्र का दौरा कर अधिकारियों को तत्काल सख्त कदम उठाने की हिदायत दे चुके हैं। गौरतलब हो कि बीती एक मई को आदमखोर कुत्तों के हमलों की अलग-अलग घटनाओं में तीन बच्चों की मौत हो गयी और सात बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गये। इससे पूर्व फरवरी व मार्च में छह बच्चे इन कुत्तों का शिकार हो गये।15 मार्च को खैराबाद के नेवादा गांव में 15 साल की सानिया जब दोपहर के वक्त शौच के लिए निकट के बाग में गयी थी उसी दौरान खूंखार कुत्तों के झुंड ने उस पर हमला कर दिया। हालांकि किशोरी की चीखें सुन ग्रामीणों ने जब उसी कर ईंट-पत्थर मार कर उन कुत्तों को भगा दिया मगर सानिया को बचाया नहीं जा सका। खजुरिया गांव का साढ़े चार साल का सिद्धार्थ थोड़ा भाग्यशाली निकला। उसी दिन हुए कुत्तों के हमले में उसकी जान इसलिए बच पायी क्योंकि गंभीर हालत में उसे तत्काल लखनऊ पहुंचा दिया गया था।
बताते चलें कि कुत्तों के इन हमलों की घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए सीतापुर जिले की प्रभारी मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने खैराबाद जाकर न सिर्फ अफसरों को तलब किया वरन कुत्तों के आतंक को आपात स्थिति घोषित कर बरेली, मथुरा और लखनऊ से विशेषज्ञों की टीमें बुलाकर आवारा कुत्तों की धरपकड़ का निर्देश दिया। प्रभावित क्षेत्र के थानों, पशु चिकित्सा विभाग, नगर पंचायत और ग्राम प्रधानों के सहयोग से खूंखार कुत्तों पर काबू पाने के लिए उपाय किये गये। पुलिस और वन विभाग की टीमें सक्रिय की गयीं। ड्रोन और नाइट विजन कैमरे भी इस्तेमाल किये गये। समस्या की अनदेखी व लापरवाही पर जिले के कई अधिकारियों के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई भी की गयी। मगर इस कवायद के वाबजूद बच्चों पर आवारा कुत्तों के हमले कम नहीं हुए। हालांकि डॉग लवर्स आदमखोर कुत्तों के हमलों की हालिया वारदातों को संदिग्ध बताते हैं। एनिमल बोर्ड ऑफ इंडिया के मास्टर ट्रेनर झशर्मा के सीतापुर में घटनास्थलों की पड़ताल के बाद यह कहने कि बच्चों पर हमलों करने का जो तरीका स्ट्रीट डॉग्स का नहीं हो सकता। अपने कथन के पक्ष में उनका तर्क है कि समूह में इस तरह अति हिंसक हो जाना कुत्तों का स्वाभाविक गुण नहीं होता। उनके इस कथन के बाद इस बारे में सही जानकारी पता करने के लिए बरेली के इंडियन वेट्रिनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने खैराबाद में पकड़े गए कुत्तों के डीएनए सैम्पल लिए हैं ताकि उनकी प्रजाति के बारे में जानकारी पाई जा सके।

दूसरी ओर सीतापुर के डीएफओ डा. अनिरूद्ध पांडेय बच्चों पर हुए इन हमलों को आदमखोर कुत्तों की करतूत बताते हैं। इस बाबत वे कहते हैं कि जितने भी हमले हुए हैं वे सुबह या दोपहर में हुए हैं, जबकि भेड़िये या लकड़बग्घे सामान्यतः रात में ही शिकार पर निकलते हैं। पुलिस व वनकर्मी भी उनके इस तर्क से सहमत हैं। यही मान रहे हैं। जानकारों का एक वर्ग आवारा कुत्तों की इस तरह की हिंसक गतिविधियों में इजाफे की वजह स्लॉटर हाउसों का बंद होना मानता है क्योंकि इससे आवारा कुत्तों के लिए भोजन की उपलब्धता कम हो जाने से वे हमलावर हो गए हैं। हालांकि दूसरा पक्ष इससे असहमत है। इन लोगों का तर्क है कि स्लॉटर हाउसों को बंद हुए एक साल से अधिक हो गया है जबकि इन कुत्तों का आतंक बीते तीन माह में गहराया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार भारत मे तीन करोड़ आवारा कुत्ते हैं तथा कुत्तों के काटने से “रैबीज़” की वजह से देश में हर साल 20 हज़ार लोगों की मौत होती है। आंकड़े बताते हैं कि “रैबीज़” के सबसे ज्यादा मामले भारत में पाए जाते हैं। वर्तमान समय में लखनऊ नगर निगम की सीमा में ही आवारा कुत्तों की संख्या 70 हजार से ज्यादा हो चुकी है तथा राजधानी लखनऊ में भी कुत्तों की हिंसक वारदात तेजी से बढ़ रही हैं। हालांकि सीतापुर की घटनाओं के बाद राज्य सरकार ने आवारा कुत्तों के बंध्याकरण की योजना को फिर से तेज करने का फैसला किया है। हालांकि इसके लिए पैसे का इंतजाम अभी नहीं हुआ है. बताया जाता है कि एक कुत्ते की नसबंदी पर एक हजार रूपए से अधिक का खर्च होता है इसलिए सरकार को इसके लिए बड़े बजट का भी इंतजाम करना होगा।
गौरतलब हो कि कुत्तों के हिंसक होने की प्रवृति को पीपुल्स फॉर एनिमल के विशेषज्ञ डा. सौरभ पर्यावरणीय परिर्वतनों से जोड़कर देखते हैं। वे कहते हैं कि देश विदेश में हुए शोध निष्कर्षों से साबित हुआ है कि ग्लोबल वार्मिग तथा जलवायु परिवर्तन का असर मानवेतर जीव जंतुओं के समान्य व्यवहार को भी तेजी से बदल रहा है। आज मनुष्य के साथ जानवरों और पशु पक्षियों का भी मूड बदल जा रहा है, उनमें भी तनाव और क्रोध बढ़ रहा है। बकौल डा. सौरभ, ध्यान कीजिए कि आज से ढाई-तीन दशक पहले शहर की सड़कों के आसपास के कुत्ते, बिल्ली, गाय-भैंस एक हॉर्न पर कोसों दूर तक भाग खड़े होते थे, आज हॉर्न मारते रहिए, वह अपनी जगह से टस-से-मस नहीं होते। कुत्ते और इंसान की दोस्ती की तमाम किस्से कहानियां पुराने समय से हमारे समाज में प्रचलित हैं। लोग कुत्ते को वफादारी की मिसाल मानते हैं। ऐसे जीव का इस तरह हिंसक हो जाना वाकई खतरनाक संकेत है।








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