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    बच्चों में बढ़ते कैंसर की पहचान को लेकर हमेशा रहें जागरूक

    By September 23, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    बच्चों में कैंसर बहुत आम नहीं है। कुछ पश्चिमी देशों में 10 लाख बच्चों में 110 से 130 बच्चों में इसकी शिकायत मिली है। आबादी के आधार पर पर्याप्त आंकड़े नहीं हो पाने के कारण भारत में इस तरह के मामलों का पूरी तरह अनुमान लगाना संभव नहीं है। हालांकि एक अनुमान के मुताबिक, 14 साल से कम उम्र के बच्चों में कैंसर के लगभग 40 से 50 हजार नए मामले हर साल सामने आते हैं। इनमें से बहुत से मामले डायग्नोस नहीं हो पाते।

    राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट की सीनियर डॉक्टर गौरी कपूर (एमबीबीएस, एमडी, पीएचडी) के अनुसार प्राय: बेहतर स्वास्य सेवा तक पहुंच नहीं होना या प्राथमिक स्वास्य सेवा कर्मियों द्वारा बच्चों में कैंसर के लक्षण नहीं पहचान पाना बीमारी पकड़ में नहीं आने का कारण होता है। कैंसर से जूझ रहे बच्चों के जीवित बचने के मामलों में पिछले 30 साल में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। आज की तारीख में बच्चों में कैंसर के करीब 70 प्रतिशत मामले इलाज के योग्य हैं। आश्चर्य की बात है कि यह सुधार बच्चों में कैंसर के इलाज की नई दवाओं की खोज से नहीं आया है, बल्कि यह सुधार तीन चिकित्सा पद्धतियों-कीमोथेरेपी, सर्जरी और रेडियोथेरेपी के बेहतर तालमेल से हुआ है। गौरी कपूर मानती हैं कि उपलब्ध थेरेपी को इलाज के नए इनोवेशन के साथ मिलाते हुए लगातार किए गए क्लीनिकल ट्रायल से यह सफलता हासिल की जा सकी है।

    इन क्लीनिकल ट्रायल को उत्तरी अमेरिका और यूरोप में बच्चों के इलाज की दिशा में कार्यरत विभिन्न टीमों ने अंजाम दिया है। यह बात लगातार दिखी है कि इस विशेषज्ञता से जीवन रक्षा के अवसर और गुणवत्ता में सुधार होता है। अमेरिकन फेडरेशन ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी सोसायटीज की ओर से 1998 में सर्वसम्मति से प्रकाशित बयान में भी इस पर जोर दिया गया था। बयान में यह भी कहा गया था, ‘समय पर इलाज मिलने से बेहतर नतीजों की उम्मीद बढ़ जाती है। बीमारी को पहचानने और इलाज शुरू होने के बीच के समय को कम से कम करना चाहिए। ‘आरजीसीआई में पेड्रियाट्रिक हेमाटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ के तौर पर कार्यरत गौरी कपूर के अनुसार भारत में स्वास्य सेवा की सुविधाओं में बहुत विविधता है। यहां सभी आधुनिकतम सुविधाओं और प्रशिक्षित कर्मियों से लैस स्वास्य केंद्र भी हैं और ऐसे स्वास्य केंद्र भी हैं, जहां बच्चों में कैंसर की पहचान और इलाज को लेकर बुनियादी ढांचा भी नहीं है।

    जैसा कि सभी विकासशील देशों में होता है, यहां भी देरी से स्वास्य केंद्र पर पहुंचने, बीमारी को पकड़ने में देरी और उचित इलाज के लायक केंद्रों तक रेफर करने की सुस्त प्रक्रिया से इलाज की दर में कमी आती है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इलाज का सर्वश्रेष्ठ मौका, पहला मौका ही होता है। पर्याप्त देखभाल के बाद भी अनावश्यक देरी, गलत परीक्षण, अधूरी सर्जरी या अपर्याप्त कीमोथेरेपी से इलाज पर नकारात्मक असर पड़ता है। एक औसत सामान्य चिकित्सक या बाल चिकित्सक शायद ही किसी बच्चे में कैंसर की पहचान कर पाते हैं। बच्चों में कैंसर के लक्षणों से इस अनभिज्ञता की स्थिति को देखकर समझा जा सकता है कि इसकी पहचान देरी से क्यों होती है या फिर इसकी पहचान क्यों नहीं हो पाती है।

    हेमेटोलॉजिकल (खून से संबंधित) कैंसर और ब्रेन ट्यूमर के अलावा बच्चों में होने वाले अन्य कैंसर प्राय: व्यस्कों में नहीं दिखते हैं। बच्चों में साकोर्मा और एंब्रायोनल ट्यूमर सबसे ज्यादा होते हैं। व्यस्कों में होने वाले कैंसर के बहुत से लक्षण हैं जो बच्चों में बमुश्किल ही दिखते हैं। बच्चों को होने वाले कैंसर में एपिथेलियल टिश्यू की भूमिका नहीं होती है, इसलिए इनमें बाहर रक्तस्रव नहीं होता या फिर एपिथेलियल कोशिकाएं बाहर पपड़ी की तरह नहीं निकलती हैं। इसीलिए व्यस्कों में जांच की उपयोगी तकनीकें जैसे स्टूल ब्लड टेस्ट (शौच में खून की जांच) या पैप स्मीयर का इस्तेमाल बच्चों में संभव नहीं हो पाता।

    हालांकि कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिन्हें देखकर स्वास्यकर्मी बच्चों में कैंसर की पहचान को लेकर सतर्क हो सकते हैं। गौरी कपूर के अनुसार इन लक्षणों के बारे में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से सूचनाओं का एक चार्ट बनाया गया है। हमारा लक्ष्य इसे प्राथमिक स्वास्य कर्मियों तक प्रसारित करना है। हमारा भरोसा है कि इससे स्वास्यकर्मी जरूरत पड़ने पर कैंसर की पहचान कर सकने और ऐसे मरीजों को बच्चों के कैंसर का इलाज करने वाले केंद्रों पर आपात स्थिति बताते हुए रेफर करने में सक्षम बनेंगे।

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