मतदान व जीत से उदासीन बसपा समर्थक

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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
चुनाव में पराजित पक्ष को ज्यादा समीक्षा और चिंता करनी होती है। गोरखपुर और फूलपुर की पराजय के बाद यह कार्य भाजपा को करना है। लेकिन विजेता को भी कई निहितार्थ पर ध्यान देना चाहिए। खासतौर पर वह दल, जिनमें सत्तापक्ष से अकेले मुकाबले की क्षमता जबाब दे चुकी है। इस समय ऐसे योद्धा देशभर में गठजोड़ की तलाश में निकल चुके है। इनका नारा है कि भाजपा को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों को एक हो जाना चाहिए। जिनका किसी भी सदन में प्रतिनिधित्व नहीं है, वह भी बाहर निकल कर हुंकार भर रहे है।
जाहिर है कि विपक्षी पार्टियों में आत्मबल का अभाव है। ऐसे में गोरखपुर और फूलपुर जितने के बाद भी सपा और बसपा गठजोड़ को कुछ बातों  पर ध्यान देना होगा।  क्योंकि एक वर्ष बाद पुनः इन स्थानों पर चुनाव होंगे। वही चुनाव केंद्र में सत्ता का निर्धारण करेंगे। पहली बात यह गौरतलब है कि जीत के उत्साह से बसपा नदारत है। ऐसा लग रहा है जैसे बसपा को सपा का कद बढ़ने की कोई खुशी नहीं हुई है। जीत का उत्साह केवल सपा में है। दूसरी बात यह कि सपा और बसपा यदि गठबन्धन करके लड़ी थी तो मतदान इतना फीका क्यों रहा।
गोरखपुर शहर विधान सभा क्षेत्र में सैंतीस प्रतिशत लोगों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया। जबकि ग्रामीण इलाकों में मतदान का फीसद 43 रहा। गोरखपुर नगर, गोरखपुर ग्रामीण, पिपराइच, सहजनवां और कैम्पियरगंज विधानसभा क्षेत्रों में मतदान की रफ्तार सुस्त रही और तीन बजे तक महज छत्तीस फीसद ही मतदान हो सका। शाम को एक बार फिर लोग घरों से निकले, जिसके चलते मतदान का प्रतिशत कुछ बढ़ सका। फूलपुर संसदीय क्षेत्र में भी मतदान बढ़ाने की सारी कवायद धरी रह गई। फाफामऊ विधानसभा क्षेत्र में तयतलिस सोरांव में पैतालीस, फूलपुर में  छियालीस इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र में इकतीस फीसद मतदान हुआ।
सबसे कम इलाहाबाद उत्तरी विधानसभा क्षेत्र में लगभग इक्कीस प्रतिशत वोटिंग हुई। सोरांव विधानसभा क्षेत्र के लखनपुर कादू गांव में जूड़ापुर हत्याकांड में निर्दोष लोगों को फंसाने के विरोध में लोगों ने मतदान नहीं किया। अफसरों ने वहां पहुंचकर लोगों को मतदान का आह्वïन किया, तब भी सिर्फ उनतीस मत ही पड़े।
इसके अलावा जीत का अंतर भी गठबन्धन की ताकीद  कराने वाला नहीं था। गोरखपुर में तो इक्कीस हजार आठ सौ इक्यासी वोट से ही जीत मिली। फूलपुर में यह अंतर अवश्य उनसठ हजार तक पहुंचा।
जाहिर है कि चुनावी प्रक्रिया के सभी  स्तर पर बसपा उदासीन रही। मतदान से पहले मायावती ने गठजोड़ के लिए कोई सद्भावना नहीं दिखाई थी। उन्होंने मात्र एक समझौता प्रस्ताव रखा था। इसके अनुसार राज्यसभा के लिए बसपा  उम्मीदवार को समर्थन के बदले गोरखपुर व फूलपुर में  गठजोड़ का प्रस्ताव था। इसमें भी मायावती ने सपा का नाम नहीं लिया था। उनका कहना था कि जो भाजपा को हराये, उसको बसपा के लोग वोट देंगे।
ईमानदारी का गठबन्धन तो यह होता कि एक स्थान से सपा और दूसरे से बसपा लड़ती। लेकिन सपा ने ऐसा कोई  प्रस्ताव नहीं किया। संभव है कि इसी कारण बसपा ने भी कोई उत्साह नहीं दिखाया।
यह मतदान के पहले की स्थिति थी। मतदान का कम प्रतिशत भी यह प्रमाणित करता है कि सपा के पक्ष में मतदान का बसपा ने कोई उत्साह नहीं दिखाया।
चुनाव परिणाम के बाद भी  इस माहौल में बदलाव नहीं हुआ। सपा का उत्साह देखने लायक था। ठीक भी है, अखिलेश यादव ने जबसे पार्टी पर नियंत्रण किया है, यह पहली सफलता है। अन्यथा सपा अपने सबसे निचले रिकॉर्ड पर पहुंच गई थी।
अखिलेश यादव और रामगोविंद चौधरी दोनों मायावती से मिलने पहुंच गए। लेकिन इस स्तर पर भी बसपा की उदासीनता दूर नहीं हुई। इसके दो कारण हो सकते है। एक यह कि बसपा में गेस्ट हाउस की जानलेवा घटना की कसक आज भी है। यह स्वभाविक भी है। जीवन से बढ़ कर कुछ नहीं होता। गेस्ट हाउस प्रकरण में मायावती के जीवन पर ही हमला हुआ था। अखिलेश के लिए यह कहना आसान है कि समझौते के लिए पुरानी बात भूलनी पड़ती है। अखिलेश के लिए यह करना आसान है। लेकिन जिसकी जान दो मिनट के अंतर पर भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी के पहुंचने पर बची हो, उसके लिए भूलना असंभव होगा।
चुनावी गठबन्धन के बाद भी मायावती की यह तल्खी कभी दूर नहीं होगी। इधर सपा जश्न मना रही थी,मायावती पंजाब दौरे पर निकल गई। वहां उन्होंने भाजपा को हराने के लिए विपक्षी एकता की पैरवी की लेकिन सपा को अलग से कोई अहमियत नहीं दी।
दूसरी बात यह कि मायावती अपनी फितरत के अनुसार यह नहीं चाहेगी की सपा बिग पार्टनर की हैसियत में रहे। इसी लिए वह दो सीटों पर सपा की जीत के प्रति सुनियोजित ढंग से उदासीनता दिखा रही है। यह स्थिति तब है जब चुनाव मात्र दो सीटों पर थे और दोनों पर सपा ही लड़ रही थी। लेकिन आम चुनाव में यही आंतरिक मतभेद ज्यादा असर दिखायेगा। समझौता हुआ तो सीट का बंटवारा होगा। लेकिन एक दूसरे को जिताने की गारंटी नहीं होगी। बसपा इस बात का ध्यान रखेगी की सपा उसके मुकाबले बढ़त न बना सके। ऐसे में यह भी हो सकता है कि अनेक क्षेत्रों में बसपा समर्थक भाजपा को वोट दें। भाजपा के साथ मायावती की निजी दुश्मनी कभी नहीं रही। भाजपा ने दलित स्मारकों ,मूर्तियों पर बुलडोजर चलाने की बात कभी नहीं की। भाजपा तो उनकी जान बचाने और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने वाली पार्टी है। समझौते के बाबजूद सपा बसपा के बीच आशंकाए बनी रहेगी।  .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।

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