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    स्कूलों में असुरक्षित बचपन!

    By January 21, 2018 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    शायद ही कभी सोचा गया हो कि हमारे बच्चे स्कूल में भी इतने असुरक्षित होंगे। पहले दिल्ली से सटे गुरुग्राम के रायन स्कूल में एक बच्चे की हत्या का मामला सामने आया, फिर लखनऊ स्थित ब्राइटलैंड स्कूल में एक बच्चे पर हमला हुआ। दोनों ही जगह आरोपी हमलावर भी बच्चा ही है। एक जगह सीनियर छात्र तो दूसरी जगह सीनियर छात्रा। इन दोनों घटनाओं ने देश भर के अभिभावकों को चिंतित कर दिया है।

    स्कूल में बच्चों की सुरक्षा का मामला एक नई समस्या के रूप में सामने आया है, जिसका समय रहते कोई न कोई हल ढूंढ लेना होगा। पैरंट्स, टीचर, स्कूल के संचालक, पुलिस-प्रशासन सबके हाथ-पांव फूले हुए हैं कि आखिर इस समस्या से कैसे निपटा जाए। स्कूल के संचालकों को एक ही रास्ता सूझता है कि सिक्युरिटी बढ़ा दी जाए। गेट से लेकर क्लास रूम तक बाउंसर खड़े कर दिए जाएं, सीसीटीवी कैमरे लगा दिए जाएं। लखनऊ के स्कूल में तो लड़कियों के कपड़े उतारकर तलाशी ली जाने लगी। इससे बच्चियों और उनके मां-बाप के भीतर भारी रोष फैला, जो कि स्वाभाविक है। ऐसे पहरे के बीच पढ़ाई-लिखाई का क्या मतलब रह जाएगा? देखते-देखते हमारे स्कूल क्या से क्या बन गए हैं? क्या शिक्षा पाना भी अब कोई युद्ध लड़ने जैसा हो जाएगा? बच्चों द्वारा अपराध की और भी घटनाएं सामने आ रही हैं।

    कभी वे दोस्तों पर हमला कर रहे हैं, कभी सगे-संबंधियों पर तो कभी शिक्षकों पर। खुदकुशी के मामले भी बढ़ रहे हैं। क्या हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारे बच्चों के मन में क्या चल रहा है? घर-परिवार, स्कूल और समाज को कहीं वे अपने शत्रु की तरह तो नहीं देखने लगे हैं? अगर वे ऐसा करते हैं तो इसके लिए उन्हें इकतरफा तौर पर दोषी नहीं माना जा सकता।

    आंख खोलने के साथ ही वे खुद को दुनिया भर की अपेक्षाओं से घिरा हुआ पा रहे हैं। तीन साल का होते ही प्ले-स्कूल और पांच साल पार करने से पहले ही मोटा डोनेशन मांगने वाले स्कूल में जाना उनकी नियति बन चुकी है। इतने छुटपन में ही उनमें से ज्यादातर को रोज नहीं तो महीने में कम से कम एक बार टीचर और मां-बाप, दोनों के सामने अपमानित होना पड़ता है।

    संयुक्त परिवार अब रहे नहीं, भाई-बहन अक्सर होते नहीं और मां-बाप अपने-अपने प्रफेशनल प्रेशर से गुजर रहे होते हैं। ऐसे में बच्चों की बात सुनने, उनके मन के घावों पर मरहम लगाने के लिए कोई होता ही नहीं। लगातार बजती खतरे की घंटियां यह मांग कर रही हैं कि कम से कम आठवीं पास करने तक बच्चों की शिक्षा और पैरेंटिंग, दोनों की कार्यसूची में पहला बिंदु उनको स्ट्रेस-फ्री रखने का बनाया जाए। ऐसी पहल सरकारें ही कर सकती हैं, लेकिन उन्हें तो अपने पॉलिटिकल अजेंडा के तहत सिलेबस बदलने से ही फुर्सत नहीं।


    बच्चों के खतरनाक दुस्साहसिक व्यवहार!

    स्कूल से छुट्टी के लिए कोई सीनियर छात्र या छात्रा किसी की जान ले ले, हमारी सोच से परे है। पर हालिया दिनों में ऐसी दो घटनाओं का होना और कल एक झगड़ालू छात्र को अनुशासन की सीख देने की सोची तो उसका प्रिंसिपल को ही गोली मार देना … कैसी विडम्बना है कम उम्र के बच्चों के ऐसे दुस्साहसिक व्यवहार ना केवल दूसरे परिवार की ज़िन्दगी उजाड़ देते हैं बल्कि खुद उनके जीवन की दिशा भी खो जाती है। अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करने लिए कुछ भी जाने कर की बच्चों की सोच को सामने रखतीं ये घटनाएँ आपराधिक मामले भर नहीं है। चिंता की बात है कि अपनी सोच समझ खोते ये बच्चे ही तो समाज के भावी नागरिक हैं। ऐसी गंभीर घटनाओं पर सोचते हैं तो लगता है कि बच्चों का मन बच्चों सा रहा ही नहीं। मासूमियत, संजीदगी और संस्कार कमी आज के दौर में बड़े हो रहे बच्चों में साफ़ दिखती है।

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