नई दिल्ली, 13 जून 2025: देशभर में भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है, तापमान 46 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। लू के थपेड़ों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है, जिससे गर्मी से संबंधित बीमारियों में वृद्धि देखी जा रही है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, उत्तर भारत के कई राज्यों में अगले कुछ दिनों तक गर्मी से राहत की उम्मीद कम है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में तापमान 44-47 डिग्री के बीच दर्ज किया गया है, जबकि पश्चिमी राजस्थान के कुछ इलाकों में यह 47 डिग्री को भी पार कर गया है।
मानसून की प्रतीक्षा में लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, लेकिन इसकी शुरुआत को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। मौसम विभाग ने 12 से 15 जून के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के सक्रिय होने की संभावना जताई है, जबकि कुछ विशेषज्ञ 13 से 17 जून तक बारिश की उम्मीद जता रहे हैं। हालांकि, मानसून के महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में ठहराव के कारण उत्तर भारत में अभी तक राहत नहीं मिली है। इस देरी ने गर्मी की तीव्रता को और बढ़ा दिया है, जिससे जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
गर्मी के साथ-साथ बिजली कटौती ने भी लोगों की परेशानी को दोगुना कर दिया है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बिजली की अनियमित आपूर्ति ने घरों में उमस और गर्मी को असहनीय बना दिया है। एयर कंडीशनर और कूलर के भरोसे रहने वाले लोग भी बिजली की कमी के कारण परेशान हैं। इससे न केवल दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि कार्यक्षमता और स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
गर्मी से बचने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम लोग पहाड़ी क्षेत्रों जैसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की ओर पलायन कर रहे हैं। हालांकि, इन क्षेत्रों में भी इस बार गर्मी का असर देखा जा रहा है, जिसने पर्यटन स्थलों को भी नहीं बख्शा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल उन लोगों के लिए है, जिनके पास आर्थिक संसाधनों की कमी है। गरीब और मजदूर वर्ग के लिए इस प्रचंड गर्मी में कोई विकल्प नहीं है। वे खुले में काम करने को मजबूर हैं, जिससे हीटस्ट्रोक और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ गया है। पिछले साल गर्मी के कारण 40,000 से अधिक हीटस्ट्रोक के मामले और 110 लोगों की मौत दर्ज की गई थी, जो इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी की तीव्रता और अवधि में वृद्धि देखी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के पैटर्न में बदलाव और अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। सरकार और स्थानीय प्रशासन ने गर्मी से निपटने के लिए कुछ कदम उठाए हैं, जैसे दोपहर के समय काम करने पर रोक और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना, लेकिन इन उपायों का प्रभाव सीमित है।
आर्थिक असमानता और चुनौतियाँ
गर्मी का असर गरीब और मजदूर वर्ग पर सबसे अधिक पड़ रहा है, जो आर्थिक तंगी के कारण पहाड़ों की ओर पलायन या अन्य राहत के साधन नहीं जुटा पा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी और लू से गरीब परिवारों को अमीरों की तुलना में पांच फीसदी अधिक आर्थिक नुकसान होता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि पारंपरिक जल निकायों का पुनरुद्धार, हरित क्षेत्रों का विस्तार और ईको-फ्रेंडली भवनों का निर्माण जैसे कदम गर्मी के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं।
दीर्घकालिक चुनौती बन रही है गर्मी
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में गर्मी का संकट केवल मौसमी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक चुनौती बन चुका है। सरकार, समाज और व्यक्तियों को मिलकर जागरूकता बढ़ाने और टिकाऊ समाधानों पर काम करने की जरूरत है, ताकि इस भीषण गर्मी के प्रभाव को कम किया जा सके और सभी वर्गों के लिए राहत सुनिश्चित हो सके।







