हस्तलिपि

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वह बहुत ख़राब है।

दूसरों की नहीं जानता,
मैं उसे देखते हुए डरता हूँ।
उसे सीने से लगाने के लिए,
अंधकार की ज़रूरत पड़ती है।

भ्रष्ट है वह इतनी सब तरफ़ से
कि उसकी नोक और पलक सँवारने में,
आँखें जवाब दे जाती हैं—
बैरंग पतों पर।

जब मैं नहीं रहूँगा
—संशय है—वह रहेगी,
मेरे अप्रकाशित को प्रकाशित करती हुई,
वह समझी नहीं जाएगी
या समझ ली गई,
तब भी क्या ही समझी जाएगी !

  • अविनाश मिश्र 
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