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    SC/ST छात्रों को मिलने वाली आर्थिक सहायता को ख़त्म करने के विरोध में उतरे बीबीएयू लखनऊ के छात्र

    By February 25, 2018Updated:February 25, 2018 Education No Comments4 Mins Read
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    दाखिला लेने के प्रतिशत में आई कमी, छात्रों ने किया प्रदर्शन

    लखनऊ, 25 फरवरी। टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान में एससी/एसटी छात्रों को मिलने वाली आर्थिक मदद को ख़त्म कर देने के विरोध में अब बीबीएयू लखनऊ के छात्र भी खुलकर विरोध में आ गए है । (AUDSU) आंबेडकर यूनिवर्सिटी दलित स्टूडेंट यूनियन के छात्रों ने TISS Mumbai में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में आज उन्होंने बीबीएयू में 25 फ़रवरी को खुलकर प्रदर्शन किया। छात्रों ने बताया कि टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान में एससी/एसटी छात्रों को मिलने वाली आर्थिक मदद को संस्थान ने ख़त्म कर दिया है।

    बता दें, इससे पहले ही टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टिस) के मुंबई, हैदराबाद, गुवाहाटी, तुलजापुर (महाराष्ट्र) कैंपस के सभी छात्रों ने 21 फरवरी से सांस्थानिक बंद का एेलान कर चुके है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के छात्रों को संस्थान से मिलने वाली आर्थिक मदद रोके जाने के बाद से ही छात्रों में रोष है जिसके चलते उन्होंने अनिश्चित काल के लिए बंद की घोषणा की।

    जानकारी के अनुसार संस्थान द्वारा एससी/एसटी समुदाय के छात्रों को भारत सरकार की पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप (जीओआईपीएमएस) योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक मदद खत्म कर दी गई है और सभी छात्रों को फीस भरने का फरमान जारी किया गया है।

    गौरतलब है कि ‘सरकार जीओआईपीएमएस ठीक से नहीं देती थी, इसलिए संस्थान खुद से आर्थिक मदद करता था और एससी/एसटी छात्रों की पढ़ने, रहने और खाने की फीस माफ़ हो जाती थी। संस्थान द्वारा 2015 में ओबीसी को मिलने वाली आर्थिक मदद बंद कर दी गई थी जिस पर अभी तक छात्र संघर्ष कर ही रहे हैं। अब अचानक से आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े एससी/एसटी छात्रों के लिए भी आर्थिक मदद बंद कर दी गई है।’

    छात्रो ने बताया कि ‘संस्थान ने यह निर्णय लेकर 200 से ज्यादा छात्रों का भविष्य खतरे में डाल दिया है. एससी/एसटी छात्रों को बड़ी मुश्किल से उच्च शिक्षा मिलती है और इनमें से कई तो अपनी पीढ़ी के पहले व्यक्ति हैं, जो इतने बड़े संस्थान में मेहनत करके पहुंचे हैं और जब इस तरह से उन्हें बीच में ही कहा जाएगा कि 70 हजार रुपये एक सेमेस्टर का भरो, तो एक छात्र कहां से भरेगा?’

    मोदी सरकार नहीं चाहती दलित और पिछड़ों का विकास हो:

    छात्र मैत्रेय गौतम का कहना है की ‘मोदी सरकार नहीं चाहती कि उच्च शिक्षा में दलित और पिछड़े पहुंचें. 2015 में ओबीसी छात्रों को मिलने वाली आर्थिक मदद को बंद करने के बाद उनके दाख़िला में कमी आई है और अब दलित और आदिवासी छात्रों को भी कोई आर्थिक मदद संस्थान से नहीं मिलेगी, तो वो भी धीरे-धीरे आना बंद कर देंगे।

    दाखिला लेने के प्रतिशत में आई कमी :

    सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, संस्थान में 2015 के बाद से ओबीसी छात्रों द्वारा दाखिला लेने के प्रतिशत में कमी आई है. 2014-15 में संस्थान में दाखिला लेने वाले कुल छात्रों में ओबीसी वर्ग के छात्रों का प्रतिशत 22 था जो 2015-16 में घटकर 20 हो गया. तो वहीं, 2016-17 में संस्थान में दाखिला लेने वाले ओबीसी छात्रों की संख्या घटकर 18 प्रतिशत ही रह गई।

    मांगे जब तक पूरी नहीं होती, तब तक हम आंदोलन जारी रखेंगे:

    छात्र जय सिंह का कहना है की ‘हमारी मांगे जब तक पूरी नहीं होती, तब तक हम आंदोलन जारी रखेंगे. जरूरत पड़ी तो हम सब दिल्ली आकर प्रधानमंत्री कार्यालय का भी घेराव करेंगे. ये कितने शर्म की बात है कि देश में छात्र शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पता नहीं सरकार की विकास की परिकल्पना क्या है? क्या शिक्षित देश विकसित नहीं माना जाएगा?
    2016-2018 और 2017-2019 सत्र के छात्रों पर ये निर्णय लागू नहीं होने चाहिए, क्योंकि दाख़िला लेते वक़्त सूचीपत्र में इसका कोई जिक्र नहीं था कि फीस भरनी होगी।

    ये मनुवादी सरकार है: प्रतीक गौतम

    सरकार पर जातिवाद का आरोप लगाते हुए प्रतीक गौतम ने कहा, ‘ये मनुवादी सरकार है और ऐसा हर संस्थान उन्हें खटकता है, जहां दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक के लिए अच्छा माहौल है. इसलिए जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय भी उनके निशाने पर है, क्योंकि वहां भी दलित और आदिवासी समाज के बच्चों को मान-सम्मान के साथ अच्छी और लगभग मुफ्त शिक्षा मिलती है।’
    प्रदर्शन करने वाले छात्र शिवम् आदित्य , सोहन राना, शशिकांत भारती , विकास रंजन, प्रेमचंद्र सोनकर , आनंद कुमार , नीरज कुमार , समीर नायक, दीपांशु ,रोहित पटेल, आनंद जैसवाल, जय सिंह, प्रतीक गौतम और मैत्रेय गौतम सैकड़ों अन्य छात्र थे।

    # BBAU Lucknow

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