शिवजी का अर्धनारीश्वर रूप उनके शक्ति का प्रतीक है शिव एक मात्र महादेव हैं जिनका आधा रूप नारी का आधा रूप पुरुष का है शक्ति के बिना सृष्टि संभव नहीं है बिना नारी के किसी का जन्म संभव नहीं है शिव और शक्ति सृष्टि का मूलाधार है बिना शक्ति के शिव शव के समान है।
शिव बाबा जगत कल्याण और अपने भक्तों के दुख के निवारण के लिये विभिन्न नामों व रुपों में प्रकट होते हैं जो देवताओं के लिये भी संभव नहीं है इन विभिन्न रुपों से मनुष्यों के साथ देवताओं की भी मुक्ति होती है शिव बाबा का त्रिदेव में सबसे ज्यादा महत्व है एक मात्र देव है जिनको महादेव भी कहते हैं एक मात्र देव हैं जिनकी ब्रम्हाण्ड प्रतीक शिवलिंग की पूजा होती है शिव की पूजा सभी देवी देवताओं ने की थी।सृष्टि की रचना ब्रम्हाजी ने की विष्णु जी पालक और रक्षक का कर्तव्य निभाते हैं इसके चलते सृष्टि में जो असन्तुलन पैदा होता है, उसकी जिम्मेदारी शिव बाबा की है।
शिव की भूमिका संहारक की है इसका मतलब यह नहीं है कि वह मृत्यु देने वाले हैं वह मृत्युंजय हैं वह संहार करके नये बीजों को, व मूल्यों के लिये जगह खाली करते हैं शिव मंगल के प्रतीक हैं शिव संस्कृति हैं शिव वस्त्र के रूप में बाघ की खाल को इस्तेमाल करते हैं यह वस्त्र ऊर्जा का प्रतीक है चन्द्र समय की निरंतरता का प्रतीक है सागर मंथन में निकले 14 रत्नों में से जब विष को देवताओं ने ग्रहण नहीं किया तो संसार को विनाश से बचाने के लिये शिव ने उस विष को धारण कर उसकी गर्मी की शांति के लिये अपने मस्तक पर शापित चंद्र को धारण कर उसको सम्मान दिया यह सन्देश है।
बुराई को गले से नीचे न उतारने का और शान्ति के लिये मस्तक को शीतल रखने का शिव अपने तन में विभूति रमाते हैं शिव अपना श्रृंगार शमशान की राख से करते हैं शिव का एक रुप सर्व शक्तिमान महाकाल का भी है शिव जन्म मृत्यु के चक्र को नियंत्रित रखते हैं उन्होंने गले में सर्प लटकाया हुआ है जो योगीश्वर रूप का प्रतीक है सांप न तो संचय करता है न ही अपने रहने के लिये घर बनाता है वह स्वतंत्र रूप से सब जगह विचरण करता है शिव के गले में सांप की तीन लपेटे हैं जो भूतकाल भविष्यकाल और वर्तमान काल का प्रतीक है शिव के हाथों में विद्यमान डमरू नाद ब्रह्मा का प्रतीक है जब डमरू बजता है तो उसकी ध्वनि आकाश पाताल पृथ्वी को एक ताल में बांध देती है यही नाद सृष्टि के सृजन का मूल बिन्दु है।
शिव के त्रिनेत्र सृष्टि के सृजन पालन संहार के केन्द्र बिंदु है एक नेत्र ब्रह्मा दूसरा विष्णु तीसरा स्वयं शिव का रूप माना जाता है कोई पहले नेत्र को धरती दूसरे को आकाश तीसरे को प्रज्ञा मानते हैं अग्नि का नेत्र खुला तो कामदेव भस्म हो गये थे शिव के तीनों नेत्र शिवा के प्रतीक है शिव के ललाट में सुशोभित तीसरा नेत्र मुक्ति का द्वार है इसलिए अनिष्ट से बचने के लिये हमेशा प्रज्ञा यानि विवेक का प्रयोग करें शिव का त्रिशूल इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान का प्रतीक है अर्थात् दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से बचने के लिये इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान का समन्वय करके सन्तुलन स्थापित करके ही कर्म करें शिव के सिर पर वेगवान गंगा नदी समाई हुई है।
शिव बाबा जटाजूट पर गंगा को नहीं थामते तो धरती को तहस नहस करके विनाश मचाती शिव ने गंगा को अपने सिर पर धारण करके केवल एक धारा को प्रवाहित किया।मनुष्य अपने उदर और रसेंद्रिय पर विजय पा ले तो इतना शक्तिशाली बन सकता है कि वह सम्पूर्ण विश्व का विजेता बन सकता है शिव अपने कंठ में विष धारण नहीं करते तो देवताओं को कभी अमृत नहीं मिलता देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाले शिव जब रौद्र रूप में अवतरित होते हैं तो कोई भी देवता उनकी शक्ति पर नियंत्रण नहीं कर सकते हैं।अपने अंदर की बुराइयों पर तीसरे नेत्र का नियंत्रण रखें तो हमेशा खुश रहेगें इन बुराइयों पर अंकुश नहीं रखते हैं तो उनका विनाश निश्चित है शिव आरंभ शिव अंत हैं,सब कुछ शिव हैं।







