एकांत..
कहां होता है एकांत
जेहन की पटरियों पर
स्मृतियों की रेलगाड़ी हमेशा
गुजरती रहती है – धड़.. धड़.. धड़..
अकेले होते ही हम खोलकर बैठ जाते हैं
जीवन के पाप-पुण्य की पोथियों को और
सिर धुनते हैं – अपनी गलतियों.. पापों.. निर्मम सोच पर
एकांत कहीं नहीं मिलता.. कहीं नहीं मिलता और
हम थक जाते हैं
लेकिन कभी-कभी अनायास
एकांत चुपचाप चला है बिना दरवाजा खटखटाये कि
हमें पता ही नहीं कुछ इस तरह
जब अपनी दुनिया के कोलाहल से बाहर
निकल हम डूब जाते हैं
किसी मजदूर-स्त्री की पीठ पर बच्चे को बांधे
ईंटा ढोते हुए देखकर,
हम देखते हैं किसी बच्चे को
दौड़-दौड़ कर अखबार बेचते हुए
हम जग जाते हैं किसी आदमी को
जाड़े की रात में फुटपाथ पर सोते हुए देखकर
आखिर एकांत मिल ही जाता है
जब हम अपनी दुनिया से बाहर निकलते हैं.
- आनंद अभिषेक







