हिंदी सिनेमा का सबसे गुस्से वाला और यादगार किरदार: कैसे बना अमिताभ बच्चन का ‘काला पत्थर’ वाला विजय खन्ना
1979 में जब यश चोपड़ा ‘काला पत्थर’ बना रहे थे, तब उनकी पहली पसंद विजय खन्ना (कोलियरी का मजदूर लीडर, जो गुस्से में आग है) के लिए शत्रुघ्न सिन्हा थे। शत्रुघ्न को डेट्स भी दे दी गई थीं। पर एक दिन शत्रुघ्न सिन्हा ने यश चोपड़ा से कहा, “यशजी, यह रोल मेरे से नहीं होगा। ये गुस्से वाला आदमी इतना इंटेंस है कि इसे सिर्फ एक ही शख्स निभा सकता है – अमिताभ!”
यश चोपड़ा ने तुरंत अमिताभ को फोन किया। उस वक्त अमिताभ ‘दीवार’, ‘ज़ंजीर’, ‘डॉन’ के बाद भी 1978-79 में कई फिल्में फ्लॉप होने की वजह से थोड़े डिप्रेशन में थे। यशजी ने स्क्रिप्ट सुनाई तो अमिताभ ने सिर्फ एक सवाल पूछा –“मेरा किरदार गुस्सा क्यों करता है?”
यश चोपड़ा ने कहा, “क्योंकि उसने अपनी नौकरी के दौरान 13 मज़दूरों को मरते देखा था और खुद को कभी माफ नहीं कर पाया।”
अमिताभ चुप रहे, फिर बोले – “मैं कर रहा हूँ।”

शूटिंग के दौरान जो हुआ, वो आज भी लेजेंड है:
वो 22 टेक वाला “ख़ून” डायलॉग : क्लाइमेक्स में अमिताभ का डायलॉग था – “तुम्हारा ख़ून, ख़ून नहीं… पानी है पानी!”
यश चोपड़ा ने कहा कि 21 टेक में भी गुस्सा पूरा नहीं लग रहा था। 22वें टेक में अमिताभ ने इतना ज़ोर से चीखा कि कैमरा ऑपरेटर डर के मारे कैमरा हिल गया। वो टेक फाइनल हुआ। आज भी वो सीन देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
शशि कपूर ने खुद कहा – “मैं पीछे रहूँगा”
शशि कपूर उस फिल्म में हीरो थे, पर उन्होंने यश चोपड़ा से कहा – “यशजी, अमिताभ को पूरा स्पेस दो। मैं तो बस सपोर्ट करूँगा।”
इसी वजह से शशि का रवि मल्होत्रा किरदार इतना ग्रेसफुल और बैकसीट पर दिखता है।

राखी का वो इम्प्रूवाइज़्ड सीन
जब अमिताभ अस्पताल में बेहोश पड़े होते हैं, राखी उनके पास आकर रोती हैं। स्क्रिप्ट में सिर्फ रोना था। पर राखी ने अचानक अमिताभ के माथे पर अपना दुपट्टा रख दिया और बोलीं – “ये दुपट्टा तुझे मेरी याद दिलाएगा।”
अमिताभ की आँखों में सचमुच आंसू आ गए। यश चोपड़ा ने कट नहीं बोला। वो सीन आज भी सबसे इमोशनल माना जाता है।
परेश रावल का पहला दिन
परेश रावल ने फिल्म में छोटा-सा रोल किया था (हेड क्लर्क)। उनका पहला शॉट अमिताभ के साथ था। परेश बाद में बताते हैं – “मैं इतना घबरा रहा था कि डायलॉग भूल गया। अमिताभ ने मुझे कंधे पर हाथ रखकर कहा – ‘डर मत, गुस्सा कर!’ और खुद इतना गुस्सा दिखाया कि मैं सच में डर गया।”
रिलीज़ के बाद का किस्सा
फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर औसत चली, पर अमिताभ का विजय खन्ना आज तक ‘एंग्री यंग मैन’ का पीक माना जाता है। 1983 में जब ‘कुली’ सेट पर गोली लगी और अमिताभ मौत के मुंह से लौटे, तो अस्पताल के बाहर सबसे ज़्यादा पोस्टर ‘काला पत्थर’ के विजय खन्ना के लगे थे , क्योंकि लोगों को लगा, “अब भी गुस्सा बाकी है, वो वापस आएगा!”आज भी जब कोई पूछता है कि अमिताभ का सबसे खतरनाक गुस्सा वाला रोल कौन-सा, तो जवाब एक ही आता है –
“काला पत्थर… वो सीन जहाँ वो चिल्लाता है – तुम्हारा ख़ून… पानी है पानी!”
और पूरा हॉल तालियाँ बजाने लगता है। सही मायने में कहा जाये तो ऐसा एक्टर, ऐसा गुस्सा, ऐसा किरदार – दोबारा नहीं बना।
जंजीर (1973) : वो फिल्म जिसने अमिताभ को ‘एंग्री यंग मैन’ का ताज पहनाया
मूल हीरो: देव आनंद, फिर राजेश खन्ना को ऑफर हुआ। दोनों ने मना कर दिया क्योंकि “हीरो पुलिस वाला नहीं, गुस्से वाला है”।
प्रकाश मेहरा ने आखिरी उम्मीद में अमिताभ को बुलाया। अमिताभ उस वक्त 11 फ्लॉप दे चुके थे। स्क्रिप्ट सुनते ही बोले – “ये मेरा रोल है।”
पहला सीन ही क्लाइमेक्स वाला शूट हुआ: वो मशहूर थप्पड़ वाला दृश्य जहाँ विजय खन्ना (अमिताभ) ठाणे में घुसकर इंस्पेक्टर को मारता है। पहला टेक ही ओके। पूरा यूनिट दंग रह गया।
फिल्म में अमिताभ का डायलॉग “ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं” आज भी सबसे ज़्यादा कोट किया जाता है।
रिलीज़ के पहले हफ्ते ही सुपरहिट। अमिताभ रातों-रात स्टार बने। उसी दिन से हिंदी सिनेमा में “एंग्री यंग मैन” का जन्म हुआ।
जया बच्चन ने बाद में बताया था – “शूटिंग के दौरान अमित इतने इंटेंस हो जाते थे कि घर आकर भी घंटों चुप रहते थे।”
अगर सही मायने में कहा जाये तो जंजीर वो आग थी जिसने अमिताभ को फीनिक्स बना दिया -राख से उठकर ‘एंग्री यंग मैन’ बन गए, जिसने हिंदी सिनेमा की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। – प्रस्तुति : सुशील कुमार







