परंपरा और आधुनिकता के अद्भुत सेतु

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   युवा दिवस (12 जनवरी) पर विशेष:   

पूनम नेगी

“उठो! जागो! और तब तक मत रुको जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न कर लो! “स्वामी विवेकानंद का कहा गया यह सूत्र वाक्य आज भी युवा मन को सर्वाधिक उद्वेलित करता है। जितनी बार भी पढ़ें, यह छोटा सा प्रेरक हर बार हमारे मन में एक नया जोश और ऊर्जा भर देता है। स्वामी विवेकानंद भारत की संत परंपरा के उन चुनिंदा महापुरुषों में से एक हैं, जो समाज के लिए श्रद्धा के पात्र होने के साथ-साथ आज भी भारतीय युवाओं के लिए एक “रोल मॉडल” हैं । धर्म और परंपरा के बारे में गहरी अंतरदृष्टि रखने वाले स्वामीजी जिस तरह अपने समय, परिवेश और पृष्ठभूमि से बहुत दूर, बहुत आगे जाकर युवाओं को एक नवीन जीवन दृष्टि देते हैं, वह  कौतूहल का विषय तो है ही; उनकी बेमिसाल मेधा और दूरदृष्टि को भी जाहिर करता है। विवेकानंद ऐसे आध्यात्मिक महापुरुष हैं जो यह मानने पर मजबूर करते हैं कि परंपरा और आधुनिकता के बीच तालमेल संभव है। किसी भी अन्य आध्यात्मिक धर्मगुरु के व्यक्तित्व में सनातन जीवनमू्ल्यों और आधुनिकता का ऐसा समन्वयकारी दृष्टिकोण कम ही दिखता है। यह इस युवा संन्यासी के कालजयी विचारों की सामर्थ्य ही है कि देशवासी उनकी जयंती को “युवा दिवस” के रूप में मनाते हैं।

 

आज से डेढ़ सौ साल पहले कोलकाता में 12 जनवरी 1863 को नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में जन्म लेने वाले इस युवा की सोच, उनका दर्शन और धार्मिक व्याख्याएं चौंकाने की हद तक आधुनिक और स्पष्ट हैं। यही वजह है कि इक्कीसवीं सदी के इस अति भौतिकतावादी, अर्थ-प्रधान तथा पेशेवर माहौल में भी उनको पढ़ना जरा भी असहज नहीं लगता। अपने व्याख्यानों, धार्मिक चर्चाओं और लेखों के माध्यम से वे जिस तरह राष्ट्र की युवा शक्ति को नेतृत्व क्षमता, नवाचार (इनोवेशन), प्रबंधन, सफलता और वैज्ञानिक सोच का पाठ पढ़ाते हैं, वह अपने आप में अद्भुत है। स्वामी जी की शिक्षाएं आज के बड़े बिजनेस स्कूलों में पढ़ाने वाले आधुनिक मैनेजमेंट गुस्र्ओं को बहुपयोगी टिप्स देती हैं। सूचना प्रौद्योगिकी से लेकर राजनीति और कारोबार से लेकर विज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय युवाओं के लिए भी उनके सूत्र अत्यन्त कारगर हैं। कितनी सही बात कहते हैं वे- मन में जब अंधविश्वास घर कर जाता है तो बुद्धि विदा हो जाती है। इसलिए किसी भी बात पर बिना अच्छी तरह चिंतन-मनन किये, उसे बिना अपने तर्क की कसौटी पर कसे अमल में नहीं लाना चाहिए। उनका यह विचार उन अंधभक्तों को आइना दिखाता है जो मात्र वाह्य प्रलोभनों के वशीभूत होकर किसी भी छद्मचोलाधारी के छलावे में फंस जाते हैं। वे कहते हैं- अच्छे बनो और अच्छा करो, एकमात्र यही सच्चा मानव धर्म है। धार्मिक पृष्ठभूमि के होते हुए भी स्वामी जी की सोच अत्यन्त प्रगतिशील और भविष्योन्मुख है। उनका चिंतन सही मायने में युवा राष्ट्र का पोषक है। उनका कहना था कि धर्म-संस्कार और तरक्की के बीच वैसा विरोधाभास नहीं है, जैसा कि बहुत से भ्रामक धारणा रखने वाले लोग मानते हैं।

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स्वामी विवेकानन्द कभी नहीं चाहते थे कि भारतीय युवा किसी धर्म, परंपरा या संस्कृति का अंधानुकरण करें। उनका कहना था कि हर भारतीय युवा को स्वयं अपनी शक्ति को समझाना व परखना होगा। दूसरों की नकल करने से व्यक्ति की सृजनशीलता व विशिष्टता दब जाती है। कोई व्यक्ति कितना महान क्यों न हो, मगर उस पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। यदि भगवान की ऐसी ही मंशा होती तो वह हर प्राणी को स्वतंत्र आंख, कान, नाक व दिमाग क्यों देते ? इसलिए हर युवा को अपना रास्ता खुद चुनना व बनाना चाहिए। इसके उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। इस तथ्य को समझाते हुए स्वामी जी कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति आम परंपरा से  हट कर अलग सोचता व करता है तो उसके बारे में तीन बातें निश्चित होती हैं- पहले उपहास, फिर विरोध और अंत में स्वीकृति। इसलिए सोच-विचार के बाद जो हमें सही लगता है, उसे अवश्य करना चाहिए बजाय दूसरे का अनुकरण करने के। वे कहते हैं कि जिस बात को हम सत्य समझते हैं, उसे अभी कर डालें। भविष्य में क्या होगा, इसकी चिंता करने की जरुरत नहीं है। शिक्षा के संबंध में विवेकानन्द का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य तथ्यों व सूचनाओं के संकलन मात्र नहीं अपितु उसे तकनीकी कौशल के साथ-साथ विद्यार्थियों को वैचारिक व चारित्रिक रूप से मजबूत बनाने वाला होना चाहिए।

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विवेकानंद के विचार युवाओं को इसलिए आकर्षित करते हैं क्योंकि वे धर्म का पुरातनपंथी चेहरा सामने नहीं रखते बल्कि धर्म को एक प्रगतिशील व उद्वेलन पैदा करने वाली शक्ति के रूप में सामने रखते हैं। “अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक है” तथा “विश्व का इतिहास उन चंद लोगों का इतिहास है, जिन्हें अपने आप में विश्वास था” ऐसे ही सरल से सूत्रों में वे जिस तरह प्रबंधन से जुड़े अहम सिद्धांत बातों ही बातों में सिखा जाते हैं, वह वाकई अनूठा है। वे कहते थे, किसी भी बात को आँख मूंदकर पत्थर की लकीर मानने से नास्तिक बनना अधिक बेहतर है। यह सच है कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा भाग धर्म के बारे में फैले भ्रमों को दूर करने में लगाया। पर उनका यह कहना भी उतना ही सत्य है कि कोई भी बात आँख मूंदकर कभी भी स्वीकार न की जाए, भले ही वह धार्मिक ग्रंथों में ही क्यों न लिखी हो। वे एक वैज्ञानिक की तरह तर्क-वितर्क, शोध, मनन और विश्लेषण के बाद तथ्यों को स्वीकार करने वाले मनीषी थे। उन्होंने कर्मकांडों के स्थान पर धर्म को संस्कारों से जोड़ा और आध्यात्मिक अवधारणाओं की सरल किंतु तर्कपूर्ण व्याख्या की ताकि वैज्ञानिक दृष्टि वाले व्यक्ति को उनकी बात सरलता से समझ में आ जाए। स्वामी जी का हिंदुत्व उदार और समावेशी था किंतु उसमें अस्पष्टता की गुंजाइश नहीं थी।  उनकी आध्यात्मिक विदेश यात्राओं की सफलता के पीछे उनकी यही वैचारिक शक्ति, मूल्यों में अडिग आस्था और गहन अंतरदृष्टि निहित थी। शिकागो में उनकी तर्कशक्ति ने विश्व को अचंभे में डाल दिया था तो इसलिए कि हिंदुत्व के प्रति उनकी विषद दृष्टि दूसरे धर्मों तथा संस्कृतियों के प्रति सम्मान पर आधारित थी; अपनी ही आस्था को सर्वश्रेष्ठ मानने के मिथ्या अहंकार से नहीं। वे तो धार्मिक स्तर पर भी संस्कृतियों के तालमेल के पक्षधर थे। यह उनके विचारों की ही ताकत थी कि अमेरिका की धरती पर इस “साइक्लोनिक हिन्दू ” की धूम मच गयी थी। आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के संदर्भ में विचार की जिस शक्ति की ओर स्वामी विवेकानंद इशारा करते हैं वह विज्ञान, कारोबार, मनोरंजन, रचनाकर्म और राजनीति जैसे क्षेत्रों का भी कायाकल्प करने में सक्षम है। एक आध्यात्मिक व्यक्ति होकर भी वे समाज से कटे हुए नहीं थे; अपने दायित्वों से विमुख नहीं थे। देश की विसंगतियां, पिछड़ापन और चारों तरफ फैला दुःख-दर्द उन्हें व्यथित करता था लेकिन यह व्यथा हताशा नहीं थी। देश के समाज-राजनैतिक हालात में बदलाव जरुरी है, वे यह बात बखूबी जानते थे। इसीलिए युवा शक्ति को जागृत करने के लिए उन्होंने अपने प्रबल विचारों का प्रयोग किया।

 

अपने समय की वास्तविकताओं की समझ रखे बिना कोई नेतृत्व सार्थकता प्राप्त नहीं कर सकता। आज हमारे देश की पहचान एक युवा राष्ट्र की है और इतनी बड़ी शक्ति की बदौलत किसी भी देश का कायाकल्प संभव है। लेकिन तभी, जब इन युवाओं के सामने एक स्पष्ट उद्देश्य तथा दिशा मौजूद हो और उन्हें अपने दायित्वों का पूरा अहसास हो। स्वामी जी युवकों के आदर्श इसलिए बने क्योंकि उन्होंने युवाओं को यही उद्देश्यपरकता प्रदान की। व्यक्ति, राष्ट्र, विश्व और धर्म के संदर्भ में उनकी प्राथमिकताएं इतनी स्पष्ट थीं कि लगता है वे कोई समाजशास्त्री हों। स्वामी जी का कहना था देशभक्ति सिर्फ एक भावना या मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है; देशभक्ति का सही अर्थ है अपने देशवासियों की सेवा करने का जज्बा। वे मन से एक विश्व मानव थे, जिनकी आकांक्षा पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की थी। देशभक्ति और वैश्विकता के बीच उनके विचारों में कहीं कोई भ्रम नहीं दिखता। स्वामी विवेकानंद प्रकृति से ही अन्वेषक थे और दूसरों के प्रति खुले विचार रखते थे। आईटी, सेवा उद्योग, आयात-निर्यात और पर्यटन जैसे क्षेत्रों को ध्यान में रखिए तो उनका यह कथन कितना प्रासंगिक लगता है कि हमें यात्रा अवश्य करनी चाहिए। हमें विदेशी भूमियों पर जाकर देखना चाहिए कि दूसरे देशों में सामाजिक तौर तरीके और परिपाटियां क्या हैं। दूसरे देश किस दिशा में क्या सोच रहे हैं। यह जानने के लिए हमें उनके साथ मुक्त और खुले संवाद से झिझकना नहीं चाहिए। जरा विचार कीजिए अपने समय की सोच से कितनी आगे थी स्वामी विवेकानंद की जीवन दृष्टि!

 

आज के युवा यह जानकर विस्मित हो सकते हैं कि विज्ञान से कोई सीधा संबंध न रखने वाला यह साधु अपने समय में युवकों से कहा करता था कि कोई विचार (आइडिया) लो और फिर उसी को अपने जीवन का मकसद बना लो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नाड़ियों और शरीर के हर भाग को उस विचार से भर लो। यही सफलता का रास्ता है और इसी रास्ते ने महान विभूतियों को जन्म दिया है। सचमुच कितने शक्तिशाली और अद्भुत विचार हैं!  क्या ऐसे विचारों की प्रासंगिकता कभी भी समाप्त हो सकती है? कभी नहीं। आज भी हर सफल इंसान की कामयाबी उनके इस कथन की सार्थकता साबित करती है। वे सच ही कहते थे कि मानव मस्तिष्क अपरिमित शक्तियों से भरा है और उससे निकला एक अनूठा विचार, एक नई अवधारणा काल विभाजक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। आखिरकार गांधी जी का “भारत छोड़ो” एक विचार ही तो था। जनक्रांति विचार से ही शुरु होती है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है। एक अन्ना हजारे न जाने कहां से “जन लोकपाल” का शक्तिशाली विचार को लेकर आये और छा गये।

स्वामी जी का कहना था, “राष्ट्र निर्माण का महान कार्य राष्ट्र की युवा शक्ति ही कर सकती है। यदि भारत के युवा “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के मंत्र को जीवन का अंग बना लें तो किसी की सामर्थ्य नहीं कि कोई उनकी राह रोक सके। युवाओं की राजनीति करने वाले आज के राजनेताओं को विवेकानंद की इस जीवन दृष्टि से प्रेरणा लेनी चाहिए। जून 1894 में मैसूर के महाराजा को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा था कि “भारत में बुराइयों की जड़ गरीबों की हालत में निहित है। हमारे निम्न वर्गों को ऊपर उठाने के लिए सबसे ज़रूरी है उन्हें शिक्षित करना और उनकी खोई हुई निजता को बहाल करना । धार्मिक-राजनैतिक ताकतों और विदेशी राजसत्ता ने सदियों से उनका इतना दमन किया है कि भारत के गरीब भूल गए हैं कि वे भी इंसान हैं। स्वामी जी कहते ही हैं कि महान उपलब्धियों का मार्ग सदा ही कांटों से भरा होता है।  मगर कड़ी मेहनत और संकल्प से सफलता जरूर प्राप्त होती है। अगर तुम एक हजार बार परास्त हो जाते हो तो एक बार फिर प्रयास करो। स्वामी जी युवकों को कहते थे कि यदि तुम दुनिया को अपनी बात सुनाना चाहते हो तो सबसे पहले अपने मन को आग्रह, दुराग्रह, और हठाग्रह आदि से मुक्त रखकर खुले मन सामने वाले की बात सुनने की आदत विकसित करो; श्रेष्ठ चिंतन व विचारों से अपने मन व मस्तिष्क को उर्वर बनाओ। निरर्थक बातों व कामों में अपनी  बौद्धिक  क्षमता एवं शारीरिक शक्ति को नष्ट करने के स्थान पर लोकहित व राष्ट्र निर्माण के कार्य करो। मन को ईर्ष्या, द्वेष, लोभ व अहंकार से मुक्त रखो। शरीर को सबल बनाने के लिए संतुलित आहार के साथ दिनचर्या को अनुशासित रखो। खेलो-कूदो, निर्द्वंद्व होकर हंसो-गाओ और पूरे मन से दुखी-पीड़ितों की सेवा करो। आज्ञा देने से पहले प्रत्येक आज्ञा पालन करना सीखो। राष्ट्र को महान व विकसित बनाने के लिए उन्होंने युवा शक्ति को तीन सूत्र दिये- 1. सदाचार की शक्ति में विश्वास और स्वयं पर पूर्ण आत्मविश्वास। 2. ईर्ष्या और संदेह का परित्याग। 3. जो सतत कर्म करने के लिए यत्नवान हों, उनकी सहायता को सदैव तत्पर रहना।

“दि एसेज ऑफ रिलीजन” से स्वामी जी को मिली नयी दृष्टि

आध्यात्मिक व भौतिक विकास के समन्वय के हिमायती स्वामी विवेकानन्द 1893 में  विश्व धर्म सम्मेलन के लिए की गयी अमेरिका यात्रा के दौरान वहां की भौतिक समृद्धि, उनकी वैज्ञानिक व तकनीकी कुशलता से बहुत प्रभावित हुए और  अमेरिकावासियों के इस गुण प्रशंसा वहां के विश्वमंच से भी की। उन्होंने कहा- हमारे पास धर्म बहुत है और तुम्हारे पास भौतिक समृद्धि। तुम हमें हमारे भौतिक विकास के लिए उद्योग धंधे दो, बदले में हम तुम्हें धर्म देंगे। धर्म व अध्यात्म के संबंध में दार्शनिक जेएस मिल की पुस्तक “दि एसेज ऑफ रिलीजन” का विवेकानन्द पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस पुस्तक ने उनकी आध्यात्मिक सोच को झकझोर कर रख दिया और उन्हें कहना पड़ा कि कमजोर आध्यात्मवादी देश की तुलना में एक शक्तिशाली भौतिकवादी राष्ट्र बेहतर है। स्वामी जी अमेरिका की कार्य संस्कृति, प्रबंधन और संगठन क्षमता से बहुत प्रभावित थे। उनका कहना है कि भारत में पांच लोग भी एक साथ मिलकर काम नहीं कर पाते क्योंकि उनकी निजी महत्वाकांक्षाएं व अहंकार टकराने लगते हैं जबकि अमेरिका इसका अपवाद है। हमें इस दिशा में इसका अनुकरण कर एक बेहतर समाज व राष्ट्र के निर्माण के लिए अहंकार और निजी महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर परस्पर मिलकर कार्य करना होगा क्यांकि संगठन, एकता व प्रबंधन ही पश्चिम के देशों की सफलता की कुंजी है।

बापू, हनुमान एवं विवेकानंद हैं युवाओं के आदर्श

प्राय: युवाओं की नकारात्मक बातों की चर्चा की जाती है। यह कहा जाता है कि कितने युवक नशे से पीडि़त हैं, कितने बेरोजगारी के कारण अवसाद से ग्रस्त हैं। कितने युवा डेटिंग और मेटिंग के चक्कर में फंसे हैं। ये बातें चिंतनीय जरूर हैं, पर इस सच का दूसरा पहलू यह भी है कि देश का 54 प्रतिशत युवा रोज पूजा करता है। आज भी युवाओं के आदर्श बापू, हनुमान एवं स्वामी विवेकानंद हैं। यह ठीक है कि आज के युवा लाखों में कमाना और शानो-शौकत से चाहते हैं, पर यह भी सच है कि 72 प्रतिशत युवा चेरिटी के लिए पैसा देते हैं। आज युवाओं ने अपनी डगर बदली है। उनमें अपने जीवन को सार्थक बनाने के साथ अपनी धरती, अपनी संस्कृति और पुरखों की विरासत को पहचानने व अपनाने की ललक बढ़ी है। इक्कीसवीं सदी के इस अत्याधुनिक समय यह परिवर्तन वाकई एक सुखद संकेत है।

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