राहुल कुमार गुप्ता
ज़मीं-ए-पाबोस बाराबंकी का वो दुलारा चला गया,
वतन की गोद से उठकर फलक का तारा चला गया।
न झुका जो बातिल के आगे, वो अलमदार-ए-वफ़ा था,
हक़ की राह में ख़ुद को जो सौंप दे, वो ही मर्दे-ख़ुदा था।
रहबरे ख़मनोई की शहादत ने एक नया इतिहास लिखा,
ज़ुल्म की काली रात में, बेबाकी का एक उजास लिखा।
मिटते नहीं वो लोग जो क़ौम की आबरू बन जाते हैं,
जिस्म तो सो जाते हैं पर किरदार अमर हो जाते हैं।
ईरान का वो सरताज
वो ईरान का पासबान अब हर दिल की शान हो गया,
बाराबंकी का दुलारा आज हक़ पर क़ुर्बान हो गया।
मिली है राह-ए-हक़ में जिसे ये अज़ीम शहादत,
नसीब उसे रमज़ान की पाकीज़ा घड़ी और इबादत।
न डरा जो ज़ुल्म से, वो जुर्रत की मिसाल बन गया,
ईरान का वो सरताज, हर दिल का मलाल बन गया।
अमर हैं वो जो सर ऊँचा रख के मौत चुनते हैं,
फ़रिश्ते भी फलक पर जिनकी दास्ताँ बुनते हैं।







