जी के चक्रवर्ती
जैसा कि हम सभी को मालूम है हमारे देश को आजादी मिलने बाद से ही चीन हमेशा से भारत के लिये सामरिक चुनौती बना रहा। यह एक बहुत बडी सच्चाई है कि वर्ष 1950 के दशकों में भारत मे सत्तासीन रहे सरकार द्वारा भारतीय सीमा की उस भूभाग को अपने कब्जे में रखने के लिये उस पर सीमांकन करने की जरूरत को यह कहते हुये नकारते रहे कि अरे, छोड़ो! हमेशा बर्फ से ढके रहने वाले ऐसे दुर्गम स्थान को अपना कहने के लिये कौन आएगा? इसी सोच के मद्देनजर इस जगह को तवज्जो न देने के कारण जिसका खामियाजा आज गलवान घाटी और अक्साई चिन के रूप में एक चुनौती बनकर हमारे सामने उभरा है।
भारत के इस भूभाग की भारत द्वारा स्वमं बहुत लम्बे समय तक अनदेखी किये जाते रहने के परिणामस्वरूप चीन ने अक्साई चीन को (अक्साई चिन पाकिस्तान और भारत देश के संयोजन में तिब्बती पठार के उत्तरपश्चिम में कुनलुन पर्वतों के ठीक नीचे स्थित एक विवादित क्षेत्र है।) अपने कब्जे ले कर वहां पर अपने सामरिक संसाधनों को पहुंचाने के लिये सड़को के निर्माण करना शुरू कर दिया है।

चीन की भारत के प्रति बहुत पहले से ही मनोव्रति द्वेष पूर्वक रही है जिसके परिणामस्वरूप आज से 58 वर्षो पूर्व 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण कर भारत को उससे युद्ध करने के लिए बाध्य किया, उस वख्त से आज तक चीन और भारत के मध्य के सम्बंध सामान्य नही रहे, भले ही कुछ दिनों तक दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध कुछ बेहतर होता हुआ, दिखाई जरूर पड़ा था, लेकिन यदि उसे हम चाइना की तरफ से भारत के प्रति एक स्वच्छ छवि बनाने की दिखावटी प्रयास की मात्र एक झलकी भर कहे तो कोई अतिशयोक्ति न होगी क्यूंकि आगे के दिनों में वह भी धूमिल पड़ती चली गयी।
इस तरह हम देखें तो वास्तव में चीन की मानो भावना ऐसा प्रयास करना दिखावा मात्र से अधिक कुछ भी न था। इसी परिपेक्ष में हमें यह कहावत बहुत सठीक लगती है कि “मुहं में राम ” बगल में छुरी, जैसी कहावतों के साकार होने वाली बात ही कही जाएगी और भारत द्वारा हमेशा चीन को विश्वास करने के उलट उसे बदले में विश्वासघात ही मिला। हम सभी को अच्छी तरह से याद ही होगा कि हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उस वख्त “हिंदी चीनी भाई भाई” जैसे एक नारा दिया था इसके वाबजूद एक भाई ने दूसरे भाई के पीठ में चाकू भोंकने वाली बात के मद्देनजर चीन ने पलट कर भारत पर आक्रमण कर दिया था इस विश्वासघात को हम भले भूला दें लेकिन हमारा इतिहास इस बात को कैसे भूल सकता है?
यदि हम कुछ वर्षों पूर्व की बात करें तो उसने भारत के चिर प्रतिद्वन्दी दुश्मन पाकिस्तान से हाथ मिला कर भारत तक सीधे पहुंचने के लिये उसके सीमा से लगी भूभाग से हो कर चीन सामरिक सड़क का निर्माण कर रहा है, क्योंकि वर्ष 1962 में भारत के साथ हुये युद्ध में उसे मिली करारी हार के मुख्य कारणों में लदाख क्षेत्र के पर्वत श्रंखला के ऊंची चोटियों पर तैनात भारतीय सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए उसे नीचे की ओर से ऊपर चढ़ना पड़ता था जिससे उसके सैनिकों के आधी ऊर्जा इन पहाड़ों के ऊँची चोटियों पर चढ़ने में ही खर्च हो जाने के बाद भारतीय सेना पर आक्रमण करना उसे हार के रूप में बहुत महंगा पड़ा था इसलिये वह अब इस क्षेत्र में सड़क का निर्माण करने में लगा हुआ है।

जब से भारत के शासन सत्ता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काबिज हुये तब से आज तक कुल 18 बार इन दोनों देशों के मध्य बातचीत और मेल मुलाक़तों का दौर चला। इन बातों को भारत और चीन के बीच संबंध सुधारने के पहल की तरह देखा गया था लेकिन आज इन दोनों देशों के मध्य तकरार की असली वजह भारत द्वारा वर्ष 2018-19 में प्रकाशित एक वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने भारत-चीन सीमा पर 3812 किलोमीटर इलाक़ा सड़क निर्माण के लिए स्थान चिह्नित किया था। वहीं पर भारत-चीन सीमा विवाद के जानकारों के अनुसार यही निर्माण कार्य दोनों देशों के मध्य विवाद की असली वजह है।
चीन और भारत के मध्य एक पड़ोसी होने के नाते वास्तव में एक भाईचारे जैसा सम्बन्ध यहां तककी एक सच्चे पड़ोसी कहलाने वाले तालुकात कभी विकसित नही हो पाया फिर भी भारत उन विद्वेषों को भुला कर वर्ष 2016 में अपना दोस्ती का हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए भारतीय रेलवे द्वारा 471 करोड़ का एक करार किया गया था लेकिन इन सबों के वाबजूद आज उसने अपने दोगले चरित्र का प्रमाण देते हुये उसके द्वारा कब्जाई गयी अक्साई चिन के भूभाग पर सीमांकन को लेकर नाहक ही भारतीय सैनिकों की जान लेने पर संकोच न करते हुये उन पर आक्रमण कर उनके जान लेने में भी गुरेज नही किया।







