एड्स पर जागरूकता के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम
ये पंक्तियाँ कवि गजेन्द्र प्रियांशु की थीं, जिन्होंने लखनऊ के लुलु मॉल में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में दर्शकों की तालियाँ बटोरीं। लेकिन इन पंक्तियों के पीछे छिपा संदेश गहरा था। जीवन की क्षणभंगुरता की याद दिलाते हुए एचआईवी/एड्स जैसी चुनौती से घबराने की बजाय जागरूक होकर उसका सामना करने की सीख।
राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी (UPSACS) और आकाशवाणी लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “स्वैग से अवरनेस” कार्यक्रम ने एक नया मॉडल पेश किया। जहाँ जागरूकता को न तो व्याख्यानों की बोरियत में और न ही डरावने पोस्टरों में ढाला गया, बल्कि इसे संगीत, हास्य, लोकगीत, कविता और अवधी स्किट के रंग-बिरंगे स्वैग में लपेटकर पेश किया गया। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक संदेश था कि स्वास्थ्य जागरूकता को यदि संस्कृति के साथ जोड़ा जाए तो वह युवाओं तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचती है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि UPSACS के अपर परियोजना निदेशक रवीन्द्र कुमार ने स्पष्ट किया कि एचआईवी/एड्स कोई सामाजिक कलंक नहीं, बल्कि एक स्वास्थ्य समस्या है, जिसका इलाज उपलब्ध है (ART थेरेपी के माध्यम से) और बचाव संभव है। डॉ. रंजना अग्रहरि के भजन, संजोली पांडेय की लोक धुनें “मैं बनाऊँ तरकारी बताके जाना…”, सुरेंद्र राजेश्वरी का “चुनरी तेरी चमकनी गुलाबी शरारा” और “बेडू पाको बार मासा” – इन सबने माहौल को जीवंत बनाया। कवियों मुकुल महान और गजेन्द्र प्रियांशु की हास्य कविताएँ, अवधी स्किट, क्विज और स्टैंडअप कॉमेडी ने गंभीर विषय को हल्का लेकिन प्रभावी बनाया। दर्शक झूमे, हँसे और सबसे महत्वपूर्ण – सोचे।
आज के दौर में जब सोशल मीडिया और मनोरंजन युवाओं की भाषा बन चुके हैं, तब पारंपरिक जागरूकता अभियान अक्सर असफल हो जाते हैं। “स्वैग से अवरनेस” जैसे प्रयास बताते हैं कि भारतीय संस्कृति की समृद्धि – लोकगीत, कविता, हास्य और स्थानीय बोली – को हथियार बनाकर हम एचआईवी/एड्स से जुड़ी भ्रांतियों, भेदभाव और कलंक को तोड़ सकते हैं। आकाशवाणी लखनऊ की कार्यक्रम प्रमुख सुमोना पांडेय का अंतिम संदेश यादगार था: “हमें समझना होगा कि एचआईवी/एड्स कोई सामाजिक कलंक नहीं बल्कि एक स्वास्थ्य संबंधी विषय है। इससे बचाव संभव है। सही जानकारी, सुरक्षित व्यवहार, नियमित जाँच और जागरूकता के माध्यम से।”
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहाँ प्रवासी श्रमिकों की बड़ी संख्या है और एचआईवी के मामले अभी भी चिंता का विषय बने हुए हैं, ऐसे सांस्कृतिक मंचों की आवश्यकता और बढ़ गई है। UPSACS और आकाशवाणी जैसे संस्थानों ने साबित किया कि जागरूकता को यदि “स्वैग” दिया जाए – यानी स्टाइल, संगीत और स्थानीय स्वाद – तो युवा न केवल सुनते हैं, बल्कि अपनाते भी हैं।
आशा है कि यह प्रयोग अन्य शहरों और संस्थानों के लिए प्रेरणा बनेगा। क्योंकि एड्स से लड़ाई सिर्फ दवाओं से नहीं, बल्कि जागरूक दिमागों और खुले दिलों से जीती जाती है। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें। गुड़हल की तरह खिलें, बबूल की तरह मजबूत रहें, और दिन आए-जाए, लेकिन जागरूकता बनी रहे।







