लखनऊ, 13 सितंबर। बलरामपुर गार्डन, अशोक मार्ग पर 22वां राष्ट्रीय पुस्तक मेला अपनी समापन बेला की ओर बढ़ रहा है। हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर ग्यारहवें दिन मेला पुस्तक प्रेमियों और सांस्कृतिक उत्साह से सराबोर रहा। किताबों की सैर से लेकर रतन सिस्टर्स की मनमोहक कथक प्रस्तुति तक, मेले ने हर दिल को छू लिया।
पुस्तक प्रेमियों ने खरीदीं मनपसंद किताबें
मेले में किताबों की दुनिया में खोए लोग अपनी पसंद की पुस्तकें चुनते दिखे। बाराबंकी के विनय ने दलित साहित्य की 15 किताबें खरीदीं, तो मधूलिका ने जय शेट्टी की संन्यासी की तरह सोचें और रोजर की फर्स्ट थिंग्स फर्स्ट को चुना। इंटर स्टूडेंट्स अवंतिका और प्रभात ने बाइनाकुलर जैसे उपकरणों पर ध्यान दिया, जबकि नन्हे पाठक ऋचा, क्षिति और आरव रंग-बिरंगी कलरिंग बुक और कहानियों की किताबों में मग्न हो गए।
साहित्य और सम्मान का संगम
मेले के मंच पर निखिल प्रकाशन के पर्यावरण चेतना और सम्मान समारोह में 108 हिंदी साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। बंगाल के सेवानिवृत्त शिक्षक सुकुमार जैन की बांग्ला पुस्तक काकोली का विमोचन भी हुआ। इसके बाद पुस्तक मेला समिति और द ट्रिब्यून के सम्मान समारोह में कैंसर संस्थान के निदेशक प्रो. एमएलबी भट्ट, प्रो. बलराज चौहान, प्रो. ए सिंह, पीएफ आयुक्त एके गुप्ता, शिक्षाविद् रचना मेहरोत्रा सहित कई गणमान्य अतिथियों ने स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों को अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न से नवाजा। सम्मानित होने वालों में डॉ. एसएन गुप्ता, डॉ. ममता गुप्ता, डॉ. फराह अरशद, सिटी एसेंस पत्रिका की ईशा सिंह और अन्य शामिल थे।
बिजली सी गति में रतन सिस्टर्स का मोहक कथक
मेले में रतन सिस्टर्स ईशा-मीशा के डांस ग्रुप की शास्त्रीय कथक और अन्य नृत्य प्रस्तुतियों में बिजली सी चपलता दिखी। ईशा-मीशा ने रुद्राष्टकम में शिव का वंदन स्तवन किया। राम वंदना के संग सूफी रंगत में छाप तिलक सब छीन्हीं… भी अलग अलग रंगों में रही।
ख्वाबों का ताना-बाना और कथक की जादुई शाम
शाम को वाणी प्रकाशन की रतन श्रीवास्तव रतन की पुस्तक ख्वाबों का ताना-बाना का विमोचन हुआ। इसके बाद भुशुण्डि साहित्य संस्थान के कार्यक्रम ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मेला मंच पर रतन सिस्टर्स ईशा-मीशा के डांस ग्रुप ने शास्त्रीय कथक और अन्य नृत्यों से बिजली सी चपलता बिखेरी। रुद्राष्टकम में शिव वंदना, राम वंदना और सूफी रंगत में छाप तिलक सब छीन्हीं ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। उनकी शिष्याओं अनुष्का सिंह और रिद्धिमा श्रीवास्तव ने गणेश वंदना और काहे छेड़ पर नृत्य कर समा बांधा।
यह मेला न केवल साहित्य का उत्सव रहा, बल्कि संस्कृति और कला का अनूठा संगम भी बन गया। जैसे-जैसे मेला अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहा है, लखनऊवासियों के दिलों में किताबों और कथक की यह खुशबू लंबे समय तक बनी रहेगी।







